प्रश्न 1. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के षष्ठ सर्ग की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के पष्ठ सर्ग का सारांश/कथावस्तु संक्षेप में लिखिए!
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण वध का वर्णन कीजिए।
अथवा “वीर कर्ण पर ही कुछ सेना की विजय निर्भर थी।” “कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
अथवा ‘कर्ण खण्डकाव्य के छठे सर्ग का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के पष्ठ सर्ग (कर्ण-वध) की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
षष्ठ सर्ग
उत्तर – ‘कर्ण’ खण्डकाव्य का पष्ठ सर्ग ‘कर्ण-वध’ इस पूरे काव्य का सबसे मार्मिक अंश है। इसका सारांश इस प्रकार है-‘
अन्ततः युद्ध होना निश्चित हो ही गया। कौरवों की ओर से पितामह भीष्म सेनापति बनाए गए और पाण्डवों की ओर से द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने यह भार संभाला। भीष्म पितामह ने यह घोषणा कर दी कि सेनापति रहते हुए वह कर्ण को युद्ध में भाग लेने की अनुमति नहीं देंगे, क्योंकि उसने द्रौपदी के साथ हुए अत्याचार में दुयोंधन का साथ दिया है।
“कुरु सेना में हैं अनेक वल वीर और बलिदानी
किन्तु कर्ण ही अर्धरथी है एक नीच अभिमानी।”
कर्ण ने भी निश्चय किया कि गंगापुत्र भीष्म के युद्ध क्षेत्र में रहते हुए मैं शस्त्र नहीं उठाऊँगा। अगले दिन भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया। निरन्तर युद्ध चलता रहा। दसवें दिन गंगापुत्र अर्जुन के बाणों से घायल हो गए और शर-शय्या ग्रहण की। भीष्म के घायल होने का समाचार पाकर कर्ण से रहा नहीं गया और वह उनसे मिलने पहुँचा।
पितामह ने प्रेमपूर्वक उसका स्वागत किया तथा दानवीर और धर्मवीर कहकर उसकी प्रशंसा की। उन्होंने इस बात पर भी खेद प्रकट किया कि तुम कौन्तेय हो, यह जानते हुए भी मैंने सूत-पुत्र कहकर तुम्हारा तिरस्कार और अपमान ही किया है। इसका मुझे बहुत दुःख है। आज बेटा कहकर तुम्हें जी भरकर निहारना चाहता हूँ। मेरा उद्देश्य वस केवल यही था कि तुम दुर्योधन का साथ छोड़ दो और भाई-भाई एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े न हों। आज मैं देख रहा हूँ कि महाविनाश होने वाला है। तुम दुयोंधन का साथ छोड़कर अपने भाइयों से जा मिलो। इसी में सभी का कल्याण है। यह सुनकर कर्ण से रहा न गया। उसने कहा कि पितामह में जानता हूं कि पाण्डव मेरे भाई हैं, परन्तु मैं अपने प्रण से बँधा हुआ हूँ।
अतः दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकता। मैं यह भी जागता हूँ कि अर्जुन के साथ गोविन्द हैं। अतः अर्जुन को हरा पाना असम्भव ही है, परन्तु मैं फिर भी अपने साहस का त्याग नहीं करूंगा और अर्जुन को मारने का अपना प्रण पूरा करने का प्रयास करूंगा। पितामह ने कर्ण के साहस की प्रशंसा करते हुए उसे उसके मार्ग पर आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया। भीष्म के पश्चात् द्रोणाचार्य सेनापति बने।
पन्द्रहवें दिन द्रोणाचार्य वीरगति को प्राप्त हुए। तय सोलहवें दिन कर्ण को सेनापति बनाया गया। यह जानकर धर्मराज युधिष्ठिर को अर्जुन की चिन्ता हुई। कर्ण के नेतृत्व में कौरव सेना ने उत्साहपूर्वक युद्ध करना प्रारम्भ किया। कुन्ती को अब भी पाण्डवों की चिन्ता थी, परन्तु वचन का धनी कर्ण अपना प्रण नहीं भूला था। उसने अवसर पाकर भी युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव का वध नहीं किया। उधर भीम के पुत्र घटोत्कच ने कौरव की सेना में हाहाकार मचा रखा था। उसे रोकने के लिए कृर्ण को विवशतापूर्वक इन्द्र द्वारा दी गई अमोघ शक्ति का प्रयोग करना पड़ा। अब यह निश्चित हो चुका था कि अर्जुन की विजय तय है। दिन अभी थोड़ा शेप था, सन्च्या होने वाली थी। कर्ण भूमि में फँसे हुए अपने रथ का पहिया निकाल रहा था, तभी अर्जुन ने कर्ण पर प्रहार करना चाहा, परन्तु उसे शस्त्रहीन और रथविहीन देखकर स्वयं को रोक लिया, परन्तु तब श्रीकृष्ण ने कहा-
“रथारूढ़ हो, या कि विरथ हा रिपु कब छोड़ा जाता बुद्ध-क्षेत्र में नहीं धर्म से नाता जोड़ा जाता।”
अर्थात् अधमर्मी शत्रु का वध करना ही सबसे बड़ा धर्म है. फिर चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हो? तब अर्जुन ने तीर छोड़ दिया और कर्ण वीरगति को प्राप्त हुआं। कर्ण जैसे परमवीर और दानवीर की मृत्यु पर श्रीकृष्ण भी स्वयं को रोक नहीं सके।
“रथ से उत्तर जनार्दन दौडे आँखों में जल-धारा ‘कर्ण! हाय वसुसेन वार’ कह बारम्बार पुकारा।” इस प्रकार महाभारत के इस प्रमुख, परन्तु उपेक्षित पात्र का अन्त हुआ।
प्रश्न 2. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर सप्तम सर्ग का कथासार लिखिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग की कथा/कथानक संक्षेप में लिखिष्ट।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के अन्तिम सप्तम सर्ग का मार्मिक चित्रांकन (सारांश) लिखिए।
अथवा युधिष्ठिर द्वारा युद्ध में मृत सगे-सम्बन्धियों के अन्तकर्म के समय जलदान देते समय कुन्ती और युधिष्ठिर के बीच हुए कथोपकथन का वर्णन ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कीजिए।
अथवा “ऐसा कीर्तिवान भाई पा, होता कौन न धन्य । किन्तु आज इस पृथ्वी पर, हतभाग्य न मुझ-सा अन्य।।” उक्त पंक्तियों में व्यक्त वेदना का भाव पठित खण्डकाव्य के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
सप्तम सर्ग
उत्तर- ‘कर्ण’ खण्डकाव्य का सप्तम सर्ग ‘जलांजलि’ इस काव्य का अन्तिम भाग है। इसका कथानक निम्न है-
कर्ण के वीरगति प्राप्त करने के पश्चात् दुर्योधन का साहस टूट गया। उसे जिस पर सबसे अधिक भरोसा था, वह भी पाण्डवों के हाथों परास्त हो गया। कर्ण के पश्चात् शल्य सेनापति बनाए गए, परन्तु दुयोंधन के सपने तो कर्ण की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो चुके थे। कर्ण के पश्चात् युद्ध अधिक समय तक नहीं चल पाया और अट्ठारहवें दिन कौरवों की पराजय के साथ युद्ध का अन्त हो गया। गदा-युद्ध में भीम ने दुर्योधन को हरा कर इस युद्ध की समाप्ति • की। कुन्ती ने कहा कि पुत्र ! तुम वीर कर्ण का नाम लेकर उसका भी जलदान करो। यह सुनकर युधिष्ठिर आश्चर्यचकित हो गए, परन्तु कुन्ती ने सत्य बताते ‘हुए कहा वह मेरा ही पुत्र था और तुम्हारा बड़ा भाई था।
“धर्मराज कुछ चौक बोले ‘सूत-पुत्र था कर्ण।’ कुन्ती बोली, “वत्स! कर्ण था मेरा रक्तं सवर्ण।”
यह जानकर युधिष्ठिर से रहा न गया और यह पूछ ही लिया कि आखिर यह क्या रहस्य है। तब कुन्ती ने विस्तारपूर्वक सारी बात बताई और यह भी बताया कि युद्ध पूर्व कर्ण को भी मैंने यह सत्य बताया था, परन्तु वह दुयोंधन से विलग होने के लिए तैयार न हुआ, लेकिन उसने वचन दिया था कि वह अर्जुन को छोड़कर मेरे किसी अन्य पुत्र का वध नहीं करेगा और उसने अपना वचन निभाया भी। सारी बात सुनकर युधिष्ठिर ग्लानि से भर उठे और भ्रातृ हत्या से उनका मन भर आया।
“ऐसा कीर्तिवान भाई पा, होता कौन न धन्य।
किन्तु आज इस पृथ्वी पर, हतभाग्य न मुझ-सा अन्य।।” कुन्ती ने युधिष्ठिर को समझाना चाहा कि दुःखी मत हो, कर्ण की यही नियति थी। इस पर युधिष्ठिर ने कुन्ती से कड़े स्वर में कहां कि अब व्यर्थ तर्क मत करो। तुमने माता होकर ही अपने पुत्र का अनिष्ट किया और भ्रातृ हत्या का कलंक हमारे मस्तक पर लगा दिया। अन्त में उन्होंने कर्ण को याद कर, उसके नाम से भी जलदान किया। युधिष्ठिर कर्ण वध को कभी न भुला सके।
प्रश्न 3. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के प्रतिपाद्य, विषय एवं उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
अथवा‘ कर्ण’ खण्डकाव्य का कथानक तथा उददेश्य स्पष्ट कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य पढ़ने से जो प्रेरणाएँ आपको मिली हों, उनका वर्णन कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य का प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य ने आपको किस रूप में प्रभावित किया है? उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर कवि केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ ने ‘कर्ण’ खण्डकाव्य में महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक कर्ण का चरित्र-चित्रण किया है। उन्होंने महाभारत की मूलकथा से कोई छेड़छाड़ नहीं की है, परन्तु इसमें कर्ण के जीवन के सभी पक्षों का समावेश न करते हुए उन्होंने केवल उन्हीं घटनाओं, प्रसंगों आदि को वर्णित किया है. जिन्होंने कर्ण के जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था उसके जीवन को गति या दिशा दी। कर्ण कुन्ती का पुत्र था, परन्तु कुन्ती द्वारा पैदा होते ही उसका त्याग किए जाने के कारण उसे अपने सम्पूर्ण जीवन में उपेक्षा, घृणा, तिरस्कार, अपमान तथा विपाद ही मिला था। कर्ण महाभारत का ऐसा पात्र है जो वीर भी था और विवेकवान एवं धर्म-अधर्म का ज्ञानी भी था, परन्तु इसके बावजूद भी उसे कभी उचित सम्मान नहीं मिला। अपने अस्तित्व के प्रश्न से जूझते हुए, उसका पूरा जीवन विसंगतियों से भरा रहा। यह सत्य है कि कर्ण एक श्रेष्ठ योद्धा, दानवीर, अपने प्रण पर अटल रहने वाला, सच्चा मित्र, तेजस्वी तथा अद्भुत आत्मवल वाला था। उसके ये गुण निश्चय ही हमें प्रेरणा देते हैं। लेकिन साथ ही, उसका चरित्र पूरी तरह से अनुकरणीय नहीं है। कवि ने उसकें चरित्र के गुणों एवं दोषों को स्थान देते हुए निष्पक्ष रूप से उसका चरित्र-चित्रण किया है। कवि जहां उसके सद्गुणों की प्रशंसा करते हुए उन्हें अपनाने की प्रेरणा देता है, वहीं उसके अवगुणों को उजागर करते हुए उनसे बचने के लिए भी सावधान करता है। कवि ने अप्रत्यक्ष रूप से यह सन्देश दिया है कि व्यक्ति में सद्गुणों का होना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उनका उचित उपयोग करना भी आवश्यक है। जो व्यक्ति सद्गुणी होते हुए भी अन्याय, अधर्म, दुराचार आदि का साथ देता है, उसका अन्त भी वही होता है जो अन्यायी का होता है। उसका अन्त सदा ही करुणाजनक एवं दुःखद होता है। यही इस खण्डकाव्य का मुख्य उद्देश्य है। इस खण्डकाव्य का शीर्षक ‘कर्ण’ सर्वथा उचित एवं सार्थक है, क्योकि ‘कर्ण’ ही इस खण्डकाव्य का केन्द्रीय पात्र है और इसमें वर्णित सभी घटनाएं उसी से सम्बन्धित है। अतः ‘कर्ण’ के अतिरिक्त इस खण्डकाव्य का कोई अन्य शीर्षक हो ही नहीं सकता।
चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न
प्रश्न 4. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख पात्र/नायक की चारित्रिक विशेषताओं को लिखिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के प्रधान पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्रांकन कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा‘ कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक ‘कर्ण’ का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्रांकन कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के अनुसार कर्ण की वीरता तथा व्यक्तित्व का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक कर्ण की दानशीलता / दानवीरता पर प्रकाश डालते हुए, उसके अन्य गुणों का वर्णन कीजिए।
अथवा कर्ण खण्डकाव्य के आधार पर नायक ‘कर्ण’ की वीरता और त्याग पर प्रकाश डालिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की वीरता तथा व्यक्तित्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर कवि केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ एक खण्डकाव्य है, जिसका नायक महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक कर्ण है। इस पूरे खण्डकाव्य में उभरकर आई कर्ण की प्रमुख चारित्रिक विशेषताएं निम्न है-
- सुन्दर, आकर्षक एवं तेजस्वी जन्म से ही आकर्षक, सुन्दर, तेजस्वी, परन्तु तिरस्कृत कर्ण सूर्यदेव से उत्पन्न कुन्ती का पुत्र था। उसके मुख पर जन्म से ही सूर्य के समान तेज व्याप्त था। कुम्ती ने जय उसे पहली बार देखा था तो यह खुशी से फूली नहीं समाई थी।
“अकस्मात् ही मिला दान में एक अनोखा लाल माँ ने देखा बेटे को आँखें हो गईं निहाल।”
युद्ध से पूर्व जब वह कर्ण को समझाने गई थी तब भी उसके मुख पर वही तेज था।
“एक सूर्य था उगा गगन में ज्योतिर्मय छविमान और दूसरा खड़ा सामने पहले का उपमान एक सूर्य था उगा गगन में पौरुष-पुंज अनूप और दूसरा खड़ा सामने, पहले का प्रतिरूप।”
सूर्य-पुत्र होने के कारण उसका रूप-सौन्दर्य सूर्य के समान ही आकर्षक एवं तेजस्वी था। कवि ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा है
“अधिरथ को क्या ज्ञात कि उसने कौन रत्न पाया है। वह क्या जाने तेज सूर्य का उसके घर आया है।।”
तेज का स्वामी होने के बावजूद कर्ण को जन्म से उपेक्षा सहनी पड़ती है। सर्वप्रथम जन्म देने वाली माता कुन्ती हो उसका त्याग कर देती है। फिर रंगशाला में सूत-पुत्र कहकर कृपाचार्य और पाण्डव उसका अपमान करते हैं। स्वयबर में द्रौपदी भी उसका तिरस्कार कर देती है। महाभारत के अन्य पात्र भीष्मादि भी बार-बार उसका अपमान एवं तिरस्कार करते है।
- धैर्यवान कर्ण के जीवन में ऐसे पल वार-बार आए, जब उसे अपमानित होना पड़ा और वह अपमान उसके लिए असहनीय हो गया। वह श्रीकृष्ण से कहता है
“घृणा, अनादर, तिरस्क्रिया, ‘यह मेरी करुण कहानी। देखो, सुनो, कृष्ण ! क्या कहता इन आँखों का पानी।”
लेकिन उसने कभी धीरज का त्यांग नहीं किया। द्रौपदी के स्वयंवर में तिरस्कृत होने पर भी वह अपने क्रोध को पी गया, कुन्ती द्वारा अपने कौन्तेय होने का पता चलने पर भी. उसने कुन्ती की इच्छा पूर्ण की। भीष्म द्वारा नीच अभिमानी कहे जाने पर भी वह उनके सम्मुख वाद-प्रतिवाद नहीं करता। इससे पता चलता है कि विपम परिस्थितियों में भी धैर्यवान बना रहता है।
- प्रण व धुन का पक्का कर्ण अपने प्रण व धुन का पक्का था। उसकी प्रतिज्ञा थी कि वह किसी दान माँगने वाले को निराश नहीं लौटाएगा। इसलिए जब इन्द्र ब्राह्मण वेश में कवच और कुण्डल माँगने आए तो कर्ण ने खुशी-खुशी उनकी इच्छा पूर्ण की, यह जानते हुए भी कि कवच-कुण्डल न होने पर अर्जुन को मारना कठिन हो जाएगा।
“मांस’ काटते थे शरीर का पर न हृदय में तड़पन
बूंद-बूंद कर रवत टपकता पर हँसते थे लोचन।”
इसी प्रकार, कर्ण ने प्रण किया था कि वह अर्जुन का वध करेगा। अपने इस प्रण पर भी वह अन्त तक अडिग रहता है। श्रीकृष्ण, कुन्ती तथा भीष्म पितामह के यह समझाने पर कि पाण्डव तुम्हारे भाई है, वह अर्जुन वध के अपने प्रण पर अडिग रहा। अन्त में उसे यह ज्ञान हो चुका था कि श्रीकृष्ण के रहते हुए अर्जुन को मारना दुष्कर है और इसकी सम्भावना अधिक है कि अर्जुन ही उसका वध कर दे, परन्तु वह अपने प्रण से नहीं हटा।
- सच्चा मित्र कर्ण दुयोंधन का संच्चा मित्र था। दुयोंधन ने उस समय उसक सामने मित्रता का हाथ बढ़ाया था, जब सभी उसका उपहास कर रहे थे। कर्ण ने हृदय से दुर्योधन को अपना मित्र माना। यह जानते हुए कि दुर्योधन अधर्मी और अत्याचारी है तथा उसका अन्त निश्चित है एवं उसके साथ रहने पर उसका अन्त भी दुर्योधन जैसा ही होगा, उसने दुयोंधन का साथ नहीं छोड़ा। आज भी जब सच्चे मित्रों की बात आती है तो कर्ण-दुयोंधन की मित्रता की चचर्चा अवश्य होती है।
- दानवीर परन्तु अहंकारी कर्ण की दानवीरता संसार भर में अमर है। उसने कभी दान देने में संशय नहीं किया। जन्म से ही अपने शरीर के अंग समान कवच और कुण्डल को, जो उसकी अपराजेयता का कारण भी थे, उन्हें भी दान में दे देना उसे महादानवीरों की श्रेणी में स्थापित करता है, परन्तु सत्य यह है कि वह अहंकारी भी था। इसलिए उसने भरी द्यूत-सभा में दुर्योधन और दुःशासन का उत्साहवर्द्धन कर द्रौपदी का अपमान किया। यह उसके चरित्र का कभी न मिटने वाला कलंक है। द्वितीय सर्ग के अन्त में कवि ने भी कहा है
“सत्य कि तुम थे कर्मवीर बलवीर धर्मधारी भी ज्ञानी और महादानी पर महा अहंकारी भी।”
- कृतज्ञ किन्तु अन्यायी का साथ देने वाला कर्ण स्वभाव से कृतज्ञ था। यही कारण है कि वह जीवनभर दुयोंधन का साथ नहीं छोड़ता है, फिर चाहे उसे अपने भाइयों के विरुद्ध ही शस्त्र क्यो न उठाने पड़े लेकिन उसकी कृतज्ञता एवं मित्रता अन्धी थी। वह दुयोंधन नामक एक स्वाथी राजा के प्रति कृतज्ञ था, जिसने उसकी शक्ति का अनुमान लगाकर उसे मित्र बनाया था। दुर्योधन जानता था कि केवल कार्ण ही अर्जुन को परास्त कर सकता है और इसी कारण उसने कर्ण की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया था। अपनी पहचान के प्रश्न से जूझने वाला कर्ण एक अन्यायी, दुराचारी और अत्याचारी के प्रति समर्पित था, जिसका उसे दुःखद परिणाम झेलना पड़ा।
- साहसी एवं परमवीर परन्तु अन्त में पराजित महाभारत के सभी पात्रों में एक कर्ण ही ऐसा पात्र है, जिसके साहस, शौर्य और वीरता की सभी प्रशंसा करते हैं। युधिष्ठिर, पितामह भीष्म, अर्जुन यहाँ तक कि स्वयं श्रीकृष्ण भी कर्ण की वीरता के प्रशंसक थे। इसलिए कवि भी कहते हैं कि
“भीष्म, द्रोण, कृपा, अश्वत्थामा सब में कर्ण अनन्य वीरो में वह महावीर प्रत्येक दृष्टि से धन्य।”
परन्तु यही अनन्य वीर अन्त में अर्जुन के हाथों मारा जाता है, क्योकि वह उस पक्ष की ओर से युद्ध कर रहा था, जिस ओर अन्याय एवं अधर्म था। अन्त में निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि कर्ण में एक नायक होने के सभी गुण विद्यमान हैं, परन्तु साथ ही उसके चरित्र में कुछ बुनियादी अन्तर्विरोध भी है। कुल मिलाकर उसका चरित्र एवं जीवन इतिहास का एक विलक्षण हिस्सा है।
प्रश्न 5. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के प्रमुख नारी पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती के चरित्र की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- ‘कर्ण’ खण्डकाव्य में केवल एक ही नारी पात्र है और वह है कर्ण को की प्रमुख विशेषताएँ निम्न है-
जन्म देने वाली कुन्ती। कुन्ती के चरित्र
- सामाजिक बन्धनों में बँधी नारी कुन्ती ने विवाह से पूर्व ही कर्ण को जन्म दिया था, परन्तु वह लोक-लाज, कुल-मयांदा आदि सामाजिक बन्धनों के भय से उसका त्याग कर देती है।
“किन्तु लाज कुल की हिंसा-सी जाग उठी तत्काल भय समाज का गरज उठा कैसा था स्वर विकराल अविरल आँसू की बूँदों से कर अन्तिम अभिषेक माता ने अपने ही हाथों दिया लाल वह फेंक।” - अपनी सन्तान के प्रति चिन्तित माता कुन्ती कर्ण, अर्जुन, भीम आदि वीर पुत्रों की माना होते हुए भी नारी सुलभ गुण, ममता से युक्त है। इसलिए युद्ध से पूर्व ही वह अपने पुत्रों को लेकर चिन्तित हो उठती है। कुन्ती की सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि युद्ध में दोनों ही ओर से उसके पुत्र एक-दूसरे के विरुद्ध अस्त्र-शस्त्र उठाकर खड़े होगे। एक ओर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल एवं सहदेव होगे तो दूसरी ओर उसी का परमवीर पुत्र कर्ण होगा।
- कर्ण जैसे पुत्र-रत्न को पुनः न पा सकने वाली अभिशप्त माता कुन्ती ने कर्ण के जन्म लेते ही उसका परित्याग कर दिया था। युद्ध से पूर्व वह किसी प्रकार साहस बटोरकर कर्ण के पास यह सत्य उद्घाटित करने जाती है कि वह उसी का पुत्र है। उसे आशा थी कि वह उसके पास लौट आएगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि कर्ण ने दुयोंधन का साथ छोड़ना स्वीकार नहीं किया।
“पर इतना ही कह पाई झूठा निकला विश्वास कहीं रहो, पर सुखी रहो जाने दो मुझे निराश।”
इस प्रकार, इस खण्डकाव्य में कुन्ती का मातृरूप कई रूपों में सामने आया है। वस्तुतः उसका चरित्र भारतीय नारी की पारिवारिक एवं सामाजिक विवशताओं को मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है, जो अपने पुत्र को अपना नहीं कह सकती।
प्रश्न 6. ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर- कवि केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘कर्ण’ में श्रीकृष्ण का पात्र अत्यन्त विशेष है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-
- पाण्डवों के शुभचिन्तक श्रीकृष्ण आरम्भ से ही पाण्डवों के हितैपी रहे है। पाण्डवों की विजय में उनका अत्यन्त योगदान है। भले ही उन्होंने युद्ध मे अस्त्र-शस्त्र न उठाया हो, परन्तु पाण्डवों को विजयश्री उन्हीं के मार्गदर्शन में मिली।
- कूटनीतिज्ञ श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए साम, दाम, दण्ड, भेद की नीति अपनाई और पाण्डवों को भी यही समझाया। युद्ध टालने के लिए पहले दुयोंधन को समझाने का प्रयास करते हैं, फिर कर्ण को सम्राट बनाने का प्रलोभन भी देते हैं। कर्ण के नहीं मानने पर वे उसे समझाते हैं कि तुम्हारी हार निश्चित है। अन्त में वे कर्ण को असहाय अवस्था में मारने के लिए अर्जुन को तैयार भी कर लेते हैं। इस प्रकार वह एक कूटनीतिज्ञ की भाँति महाभारत की प्रत्येक घटना को प्रभावित करते है।
- सद्गुणों के प्रशंसक श्रीकृष्ण शत्रु पक्ष के वीरों की प्रशंसा करने से नहीं चूकते। कर्ण की वीरता की प्रशंसा करते हुए वे कहते हैं
“धर्मप्रिय, धृति-धर्म धुरी को तुम धारण करते हो। वीर धनुर्धर, धर्म भाव तुम भू-धर में भरते हो।”
- मायावी श्रीकृष्ण को सभी परम मायावी मानते हैं, क्योंकि वे परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेते हैं। यद्यपि वे युद्ध में अर्जुन के सारथी बनते हैं और अस्त्र-शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा करते हैं, परन्तु फिर भी सभी मानते हैं. कि पाण्डवों को विजय श्रीकृष्ण ही दिला सकते हैं। कर्ण भी कहता है कि कृष्ण की माया अर्जुन को घेरे रहती है और अन्ततः वही होगा जो कृष्ण चाहेंगे।








