प्रश्न 1. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख पात्र / नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर भरत की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर भरत/नायक की विशेषताओं/चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर भरत का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ में “भरत, मानव सेवा और भ्रातृ-प्रेम की साकार मूर्ति हैं।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ के प्रमुख नायक (प्रधान पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के मुख्य पात्र की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- श्री लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘कर्मवीर भरत’ के प्रमुख पात्र दशरथ-पुत्र भरत हैं। वे राम के छोटे भाई हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- भावुक हृदय भरत रामायण के सबसे भावुक पात्र हैं। इस खण्डकाव्य में भी उनका चित्रण इसी प्रकार हुआ है। वह किसी भी अनिष्ट की आशंका होने पर व्याकुल हो उठते हैं। पिता के स्वर्गवास का समाचार सुनकर वह शोक के सागर में डूब जाते हैं और दशरथ का शव देखकर मूच्छित होकर गिर पड़ते हैं। पिता का देहान्त, राम का वनगमन और उर्मिला की विरह-कथा सुनकर वे स्वयं को ही इन सबके लिए दोषी मानते हैं। भावना के आवेग में बहकर वह राम से मिलने वन ही पहुँच जाते हैं।
- आदर्श महापुरुष इस खण्डकाव्य के नायक भरत का चरित्र सभी के लिए आदर्श है। वे शील, तप, त्याग और साहस की साक्षात् मूर्ति हैं। उनके विचार बहुत उच्च एवं महान् हैं। वे अपने वंश की परम्परा को आगे ही बढ़ाते हैं, इसलिए वे राज्य मिलने पर भी उसे बड़े भाई के चरणों में समर्पित कर देते हैं। वे बार-बार कहते हैं कि पिता की मृत्यु और बड़े भाई राम के वनवास जाने का कारण वही हैं। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि कोई उनके चरित्र पर सन्देह करे और कुल की कीर्ति को कलंक लगे।
- परम त्यागी भरत को अपने पिता से अयोध्या का राज मिला था। यदि वे चाहते तो राजा बनकर सुखपूर्वक अवध में रह सकते थे, परन्तु उन्होंने सभी के कहने पर भी राजा बनना स्वीकार नहीं किया। राज्य के प्रति उनके मन में तनिक भी लोभ नहीं था। अन्त में वे राम को उनका अधिकार लौटाकर यह सिद्ध भी कर देते हैं। राज्य के प्रति उनकी अनासक्ति से सभी परिचित हैं। सुमित्रा भी कहती हैं कि-
“नहीं राज्य-वैभव में है अनुरक्ति तुम्हारी, तुम विदेह हो, अटल राम की भक्ति तुम्हारी।” - राम के अनन्य भक्त भरत राम को अपना बड़ा भाई ही नहीं मानते, वरन् स्वयं को उनका दास मानते हैं। वे कहते हैं
“लघु भ्राता ही नहीं नाथ! मैं दास तुम्हारा।”
एक सच्चे भक्त की भाँति उनका मन राम के चरणों में ही बसता है। उनकी भक्ति भावना और प्रेम के सामने राम भी बहुत भावुक हो जाते हैं। भरत जब राम से मिलने चित्रकूट जाते हैं, तो वे पैदल ही जाना चाहते हैं, परन्तु माता कौशल्या के कहने पर वे विवश होकर रथ पर सवार होते हैं। राम को देखने के पश्चात् तो वे स्वयं को रोक ही नहीं पाते हैं और उनके चरण पकड़ लेते हैं। भरत की इस भक्ति भावना से राम भी गद्गद् हो जाते हैं।
“राम चाहते थे भ्राता को अंक लगाना, पद पकड़े थे भरत, कठिन था उन्हें उठाना। स्नेह सहित कर खींच, भरत को गले लगाया, दशा देख करुणानिधि का अन्तर लहराया।”
- सच्चे कर्मवीर भरत सच्चे कर्मवीर हैं। वे अपने माथे पर लगे कलंक को धोने के लिए राम के स्थान पर स्वयं वन में रहने के लिए भी तैयार हैं।
“वास करूँगा वन में भाई का प्रतिनिधि बन, आप अयोध्या जाएँ, पड़ा सूना सिहासन।”
जब राम उन्हें समझाते हैं, तब भी वे राज्य लेने के लिए तत्पर नहीं होते और उनके प्रतिनिधि बनकर चौदह वर्षों तक अयोध्या का कार्यभार सँभालने का भार उठाते हैं। वे अयोध्या लौटने पर राम की भाँति ही नगर के बाहर नन्दीग्राम में पर्णकुटी बनाकर रहते हैं और वहीं से सारा राज-काज देखते हैं। भरत चौदह वर्षों तक राजा बनकर नहीं, अपितु योगी बनकर रहते हैं। उन्होंने राम के आदर्शों का पालन कर सच्चे कर्मवीर होने का प्रमाण प्रस्तुत किया।
खण्डकाव्य के नामकरण का औचित्य भरत के नाम पर इस खण्डकाव्य का ‘कर्मवीर भरत’ नामकरण सर्वथा उचित है। उनके जीवन में कर्म ही सर्वोपरि था। वे चाहते तो सरलता से मिले राज-पाट को ग्रहण कर राजा बन सकते थे, परन्तु उन्होंने राज्य ठुकरा दिया। यद्यपि उन्होंने राजा के समान ही चौदह वर्षों तक अयोध्या का कार्यभार सँभाला, परन्तु उन्होंने राजा का पद नहीं लिया। एक सच्चे योगी और कर्मवीर की भाँति उन्होंने केवल कर्त्तव्य को महान् समझा। अतः इस खण्डकाव्य का शीर्षक ‘कर्मवीर भरत’ पूर्णतया उचित है।
प्रश्न 2. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर कैकेयी का चरित्र-चित्रण संक्षेप में कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य की कैकेयी के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के किसी स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर कवियों और लेखकों ने अब तक कैकेयी के चरित्र को विमाता और कुटिल बुद्धि रानी के रूप में ही चित्रित किया है, परन्तु इस खण्डकाव्य मे कवि ने कैकेयी के चरित्र को उज्ज्वल बनाकर उसे गौरव प्रदान किया है। कैकेयी के चरित्र के उदात्त पक्ष को उभारना इस खण्डकाव्य की एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।
कैकेयी की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
- वीरांगना कैकेयी युद्ध-क्षेत्र और कर्म-क्षेत्र दोनों में ही वीरांगना की भाँति उपस्थित है। वे रण-विद्या में कुशल हैं। एक बार उन्होंने युद्धक्षेत्र में महाराज दशरथ की सहायता कर उनके प्राण बचाए थे। इसी प्रकार वे कर्म-क्षेत्र में भी अपनी वीरता और साहस का परिचय देती हैं। वे राम से अगाध स्नेह रखती हैं, परन्तु फिर भी उन्हें वनवास भेजती हैं, क्योकि वे राम को यशस्वी बनते हुए देखना चाहती हैं। उसे राम के बल-पौरुष पर पूर्ण विश्वास है। अपने हृदय की वीरता का परिचय देते हुए वे कहती हैं-
“असि अर्पण कर मैंने रण कंकण बाँधा है,
रण-चण्डी का व्रत मैंने रण में साधा है।
मेरे बेटों ने पय पिया सिंहनी का है,
उनका पौरुष देख इन्द्र मन में डरता है।”
- कर्त्तव्यपरायणा कैकेयी अपने सभी कर्तव्यों को नली-भाँति समझने वाली तथा उनका पालन करने वाली सशक्त नारी हैं। वे एक क्षत्रिय माता होने के साथ-साथ अयोध्या की रानी भी हैं, इसलिए वे चाहती हैं कि राम वनवासी बनकर प्रजा के कष्टों को दूर करें, जिससे मानवता का उद्धार भी होगा और राम को यश-प्राप्ति होगी। वे कहती हैं कि-
“केवल जन कर पुत्र न कोई बनती माता,
वे क्या, कष्टों के भय से यदि रोई माता ?
चढ़ती वय में यदि न चढ़ा पौरुष का पानी,
तो सुख-शय्या पर न बनेगी अमर जवानी।।”
- मानवता का हित चाहने वाली कैकेयी स्वयं तक सीमित रहने वाली राज-स्त्री नहीं हैं। वे उनकी भी शुभचिन्तक हैं, जो युगों-युगों से दबे हुए अशिक्षित हैं और अन्धकार में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे सभी को ईश्वर की सन्तान समझती हैं और सबका भला चाहती हैं। उदार बनकर मानवता की रक्षा करना एवं उनका उत्थान करना वे राजा का कर्त्तव्य मानती हैं, इसलिए वे राम को भी यही समझाती हैं कि वनवास धारण कर तुम मानवता को सुखी करो। वे जानती हैं कि संसार उस पर अनेक आक्षेप लगाएगा, परन्तु मानव सभ्यता को उठाने हेतु लिए गए निर्णय पर उसे तनिक भी पछतावा नहीं है “लोग भले ही मुझे स्वार्थ-रत नीच बताएँ, भले क्रूर माता कह मुझे कलंक लगाएँ। पर मैंने जो किया उसी में सब का हित है, जन-जीवन हेतु व्यक्ति का त्याग उचित है।”
- स्पष्टवादिनी तथा राम के प्रति अगाध स्नेह रखने वाली कैकेयी अपने हृदय के विचारों को स्पष्ट रूप से सबके सामने रखती हैं। इसीलिए वे भरत को धैर्य के साथ दशरथ-मरण एवं राम वनगमन का प्रसंग सुनाती है। भले ही भरत अपनी माता कैकेयी पर रोष प्रकट करते हैं, परन्तु फिर भी वे बिना कुछ उलट-फेर के सत्य उनके सामने रखती हैं।
वे राम से बहुत प्यार करती हैं। इस बात को कौशल्या भी स्वीकार करती हैं “कैकेयी ने सदा राम का हित देखा है, पर पढ़ पाया कौन कुटिल विधि का लेखा है। उसने मुझसे अधिक राम को पहचाना है, और राम ने मुझसे अधिक उसे माना है।”
इसी प्रेमभाव के कारण कैकेयी राम को मानवता के उद्धारक के रूप में यश दिलाना चाहती हैं। राम को वन भेजने के पीछे उसकी भावना महान् है। वे कहती हैं
“राज्य राम के लिए नहीं लगना महान् है, उसमें पौरुष-प्रतिभा है, वे कीर्तिमान है। उसके उर में प्रवाहमान मानव की ममता, समतामय समाज-रचना की उसमें क्षमता।।”
इस प्रकार, इस खण्डकाव्य में कैकेयी के चरित्र के उज्ज्वल पक्ष को उभारकर उसे गौरवमयी बनाया गया है। कवि ने कैकेयी के चरित्र को एक भिन्न रूप में अभिव्यक्त करने में सफलता प्राप्त की है।
प्रश्न 3. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर कौशल्या के चरित्र की विशेषताएँ लिखिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर कौशल्या का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर- रामायण महाकाव्य की प्रमुख पात्र कौशल्या कौशल प्रदेश के राजा सुकोशल एवं रानी अमृतप्रभा की पुत्री थीं। वे अयोध्या के राजा दशरथ की पत्नी एवं उनकी तीन सौ रानियों में पटरानी थी। कौशल्या का सबसे पहला उल्लेख वाल्मीकि रामायण में पुत्र-प्रेम में चाह रखने वाली माँ के रूप में हुआ है। मानस ग्रन्थ में कौशल्या के चरित्र में उच्च बुद्धिमत्ता का चित्रण हुआ है। यद्यपि कैकेयी के यशस्वी चरित्र के सामने कौशल्या का व्यक्तित्व कुछ दव-सा गया है, लेकिन अपने जीवन के प्रारम्भ से लेकर अन्त तक कौशल्या ने पटरानी राजमाता के अनुरूप मर्यादा का पालन किया है। कौशल्या की चारित्रिक विशेषताएँ निम्न हैं-
- मर्यादा का पालन करने वाली दशरथ की पटरानी होने के फलस्वरूप कौशल्या को राजभवन में अत्यन्त उच्च स्थान प्राप्त था।
उनका आचरण शालीनतापूर्ण था। वे मर्यादा का पालन करती थीं। कैकेयी से आकर्षण के कारण पति से उपेक्षित व्यवहार मिलने के फलस्वरूप उनके मन में असन्तोष अवश्य था, किन्तु उन्होंने इसे किसी के सामने कभी प्रकट नहीं किया था। पुत्र का राज्याभिषेक होने के समाचार से उन्हें खुशी हुई तथा किसी हद तक राजमाता बनकर जीवन के उपेक्षित पलों से मुक्त होने की भावना थी। पुनः कैकेयी और मंथरा के षड्यन्त्र से पुत्र राम के वनगमन के समाचार को सुनकर वे विचलित हो गई। अपराधी पति दशरथ को भला-बुरा कह सुनाया एवं राम के साथ वन जाने को तत्पर हो गईं। राम के यह कहने पर कि “पति की सेवा उनका प्रथम कर्त्तव्य है,” उन्होंने राम के साथ वन जाने का विचार त्याग दिया। उन्होंने राम को कल्याण-यात्रा के लिए आशीर्वाद दिया। राम के वन चले जाने पर दशरथ के दुःखों का पारावार नहीं रहा। पुत्र के विरह को भूलकर विषादग्रस्त राजा को कौशल्या ने अपना सहारा दिया।
दशरथ की मृत्यु के समय भी वे उनके साथ थीं। पति के न रहने पर उनकी कान्तिहीन दशा एवं शोक उनकी मर्यादा के अनुरूप थे।
- धर्मपरायणा कौशल्या धर्मपरायणा थीं। पुत्रेष्टि यज्ञ की पूर्व सन्ध्या पर पति के साथ यज्ञ के लिए दीक्षित होने वाली रानी कौशल्या ही थीं।
दशरथ की मृत्यु के पश्चात् दूत भरत को बुलाने के लिए गए। भरत ने दूतों से अयोध्या के विषय में समाचार पूछने के क्रम में कौशल्या को ‘धर्मपरायणा’ कहकर सम्बोधित किया था। भरत जब अयोध्या आए तो कौशल्या का हृदय पुत्र के प्रेम से अत्यधिक स्नेह से भर गया। उन्होंने भरत एवं शत्रुघ्न को आशीर्वाद दिया। भरत को छाती से लगाकर वे विलाप करने लगीं। उन्हें समझाते हुए उन्होने कहा कि इस घटना चक्र में उनका या कैकेयी का कोई दोष नहीं है। होनी तो होकर ही रहती है तथा भरत को कर्त्तव्यपालन करने की प्रेरणा दी। भरत के राम से मिलने जाते समय वे उनके साथ वन भी गई थीं। वहाँ उन्होने समय-समय पर दुःखी भरत को सांत्वना भी दी थी। घोर निराशा एवं दुःखद क्षणों में भी उन्होंने वन में भरत के प्रति अपने मातृ-धर्म का पालन किया था। अपने पुत्र राम को उन्होंने कहा है
‘धर्मज्ञ इति धार्मिक धर्म चरितुमिच्छसि’
अर्थात् हे पुत्र। तू धार्मिक है। धर्म के अनुकूल आचरण कर।
दुःख के क्षणों में भले ही कौशल्या विचलित हो जाती थीं, किन्तु वे अपने को संयमित करके सदा धर्म के मार्ग पर चलती थीं। उन्होंने मातृ-धर्म एवं भार्या धर्म का सदा पालन किया।
- धैर्य एवं दया की मूर्ति पुत्र के वनगमन एवं पति की मृत्यु से प्राप्त दुःखों में भी कौशल्या धैर्य धारण करती हैं। पुत्र के वियोग के क्षणों में उन्होंने धैर्य का पालन किया, पति की आज्ञा का सम्मान करते हुए अपने पुत्र को उन्होंने कभी वन से अयोध्या आने के लिए नहीं कहा। पुत्र-वियोग जैसे महान् कष्ट को उन्होंने धीरता से सहन किया। चित्रकूट में सीता की माँ को सांत्वना देते हुए कौशल्या ने उन्हें धैर्य धारण करने के लिए कहा। उनके इस कथन में उस समय दार्शनिकता के साथ-साथ गहरी आत्मानुभूति प्रदर्शित होती है। मानस में कौशल्या का चरित्र गम्भीर एवं धैर्यनिष्ठ है। तुलसीदास ने गीतावली मे उन्हें दयावान बताया है। राम के वियोग में अयोध्यावासी अत्यन्त दुःखी हैं। विशेषकर उनके घोड़े जो राम के वन जाने के पश्चात् उनके वियोग में • अत्यन्त दुर्बल हो गए है, उन पर कौशल्या को दया आती है। वे पथिक से राम को सन्देश भेजती हैं कि वे एक बार उन घोड़ों से मिलने अवश्य आएँ एवं पुनः वन चले जाएँ। जब राम और लक्ष्मण मुनि विश्वामित्र के साथ चले जाते हैं, तब कौशल्या उनके लिए चिन्तित हो जाती हैं। उनकी व्यथा क्रमशः राम के वन-गमन, पति के मृत्योपरान्त हुए उनसे विछोह, चित्रकूट से लौटने एवं राम, लक्ष्मण एवं सीता के वनवास की लम्बी अवधि के समय में करुणापूर्ण चित्रित की गई हैं।
- राजमाता का गौरव राम के वन गमन के पश्चात् कौशल्या की चर्चा नगण्य रही है। इस लम्बी अवधि में अदृश्य रही महारानी कौशल्या राम के वनवास से लौटने पर पुनः दिखाई पड़ती है। वाल्मीकि ने पुत्र-विरहिणी विधवा माता का दुर्बल और कान्तिहीन करुण दशा का चित्रण किया है। पुत्र के राजा बनने के पश्चात् उन्होंने राजमाता के पद को दीर्घकाल तक भोगा। अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक उन्होंने राजमाता के पद को सुशोभित किया, जिसकी उन्हें आकांक्षा थी एवं वे उसकी वास्तविक हकदार भी थीं।
अतः यह कहा जा सकता है कि कौशल्या एक आदर्श महिला, आदर्श पत्नी एवं आदर्श माता थीं।
प्रश्न 4. ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर राम का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर राम का चरित्रांकन कीजिए।
अथवा ‘कर्मवीर भरत’ खण्डकाव्य के आधार पर राम के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- कवि लक्ष्मीशंकर मिश्र ‘निशंक’ द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘कर्मवीर भरत’ के नायक भरत हैं, परन्तु फिर भी राम के कारण ही भरत के चरित्र का विकास होने से राम भी महत्त्वपूर्ण पात्र बन गए हैं। यद्यपि राम अन्तिम सर्ग में ही प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होते हैं, परन्तु सम्पूर्ण खण्डकाव्य में उनके व्यक्तित्व की पर्याप्त चर्चा हुई है। राम की चारित्रिक विशेषताएँ निम्न हैं-
- उदात्त गुणों से सम्पन्न एवं रघुकुल का गौरव राम समस्त श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न हैं। वे शक्ति, शील और सौन्दर्य के सागर हैं। उनके हृदय में दया, करुणा, ममता, सहनशीलता तथा कल्याणकारी भावनाओं का निवास है। उनके शक्ति, साहस और पौरुष के समक्ष दानव-मानव कहीं ठहर नहीं पाते। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे रघुकुल के आदर्श हैं तथा सभी को प्यारे हैं। इन्हीं गुणों के कारण कैकेयी राम को अपने सभी पुत्रों में श्रेष्ठ मानती हैं। अतः उन्होंने जन-सेवा के लिए राम को ही वन भेजा।
- दृढ़तापूर्वक कर्त्तव्यपालन करने वाले राम दृढ़ निश्चयी हैं और कभी भी कर्त्तव्य के पथ से पीछे नहीं हटते। कैकेयी के समझाने पर वे सहर्ष वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। जब भरत उन्हें अयोध्या वापस लौटने के लिए कहते हैं, तो वे दृढ़तापूर्वक अपने प्रण पर डटे रहते हैं। उन्हें अपने पिता के वचनों की, कुल की मर्यादा की तथा माता की शिक्षा का स्मरण है। अतः वे दृढ़तापूर्वक कर्तव्य-पथ पर चलते रहते हैं।
- भरत के प्रति अगाध स्नेह जिस प्रकार भरत की भक्ति राम के प्रति अटूट है, उसी प्रकार राम के मन में भी भरत के प्रति अगाध स्नेह है। जब भरत सभी को साथ लेकर सेना सहित चित्रकूट आते हैं, तो लक्ष्मण को भरत की निष्ठा पर सन्देह होता है, परन्तु राम को तनिक भी सन्देह नहीं हुआ, क्योंकि वे भरत को अच्छी प्रकार समझते थे और भरत के लिए वे अपयश भी स्वीकार कर सकते थे। वे भरत की प्रेम-धारा में बहते हुए कहते हैं
“बोले जो भी कहो वो मैं आज करूंगा, तुम कह दो तो अयश-सिन्धु में कूद पडूंगा।”
इस प्रकार ‘कर्मवीर भरत’ में राम के जाने-पहचाने एवं सर्वमान्य स्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम का चित्रण हुआ है।








