प्रस्तावना-
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार, समालोचक, शिक्षाविद् और विचारक थे। दक्षिण भारत में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने अपने निबंधों और आलोचनात्मक लेखों के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाया तथा हिंदी को राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम माना।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन-
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का जन्म 10 अप्रैल 1919 ई० को आंध्र प्रदेश के बेल्लूर जनपद के बत्तुलपल्लि ग्राम में हुआ था। उनका प्रारंभिक जीवन दक्षिण भारत के सांस्कृतिक वातावरण में बीता। बचपन से ही वे मेधावी, परिश्रमी और अध्ययनशील थे। उन्हें भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के अध्ययन में विशेष रुचि थी। हिंदी के प्रति विशेष लगाव के कारण उन्होंने आगे चलकर हिंदी साहित्य को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

शिक्षा-
उनकी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत और तेलुगु भाषा में हुई। बाद में उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य का गहन अध्ययन किया तथा उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे बहुभाषाविद् थे और हिंदी के साथ-साथ तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयालम भाषाओं का भी अच्छा ज्ञान रखते थे।
कार्य जीवन-
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी ने अपना अधिकांश जीवन अध्यापन और शोध कार्य में बिताया। वे लगभग 30 वर्षों तक आंध्र विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे। उन्होंने हिंदी शिक्षा के विकास, शोध कार्यों और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया। उनका पूरा कार्य जीवन हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा को समर्पित रहा।
साहित्यिक जीवन एवं योगदान–
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी श्रेष्ठ विचारक, समालोचक और निबंधकार थे। उन्होंने हिंदी साहित्य, भाषा, संस्कृति और समाज से जुड़े अनेक विषयों पर लेखन किया। उनकी रचनाओं में गहन चिंतन, तार्किकता और विश्लेषणात्मक दृष्टि दिखाई देती है। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा हिंदी साहित्य के विकास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
कृतियाँ-
प्रो. रेड्डी के अब तक आठ ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं।उनके नाम इस प्रकार हैं-
- साहित्य और समाज
- मेरे विचार
- हिन्दी और तेलुगू : एक तुलनात्मक अध्ययन
- दक्षिण की भाषाएँ और उनका साहित्य
- वैचारिकी
- शोध और बोध
- वेलुगु वारुल (तेलुगू)
- ‘लैंग्वेज प्रॉब्लम इन इण्डिया’ (सम्पादित अंग्रेजी ग्रन्थ)
इनके अतिरिक्त हिन्दी, तेलुगू तथा अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में इनके अनेक निबन्ध प्रकाशित हुए हैं। इनके प्रत्येक निबन्ध में इनका मानवतावादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
भाषा शैली-
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी की भाषा शुद्ध, परिष्कृत, परिमार्जित तथा साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें सरलता, स्पष्टता और सहजता का गुण विद्यमान है। इन्होंने संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ, उर्दू, फारसी तथा अंग्रेजी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया है। इन्होंने अपनी भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया है। इन्होंने प्रायः विचारात्मक, समीक्षात्मक, सूत्रात्मक, प्रश्नात्मक आदि शैलियों का प्रयोग अपने साहित्य में किया है।
हिन्दी साहित्य में स्थान-
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी हिन्दी साहित्य जगत के उच्च कोटि के विचारक, समालोचक एवं निबन्धकार हैं। इनकी रचनाओं में विचारों की परिपक्वता, तथ्यों की सटीक व्याख्या एवं विषय सम्बन्धी स्पष्टता दिखाई देती है। इसमें सन्देह नहीं कि अहिन्दी भाषी क्षेत्र से होते हुए भी इन्होंने हिन्दी भाषा के प्रति अपनी जिस निष्ठा व अटूट साधना का परिचय दिया है, वह अत्यन्त प्रेरणास्पद है। अपनी सशक्त लेखनी से इन्होंने हिन्दी साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है।
निधन–
प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का निधन 30 मार्च 2005 ई० को हुआ।








