लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
(a) हमारे पाचन में अम्ल की भूमिका क्या है? वर्णन कीजिए।
(b) कौन-सी त्वचीय ग्रन्थि स्तन ग्रन्थि के रूप में परिवर्धित होती है?
(c) मनुष्य में कितनी जोड़ी लार ग्रन्थियाँ होती हैं?
उत्तर :
(a) (1) HCl जठर रस को अम्लीय बनाता है। असक्रिय पेप्सिन HCI से मिलकर ही सक्रिय रूप लेता है। प्रोटीन का पाचन यह अम्लीय pH में ही सम्पन्न कर पाता है।
(2) HCI भोजन के साथ शरीर में प्रवेश कर गए जीवाणुओं को मार देता है।
(b) पसीने की ग्रन्थि (sweat or sudorific gland)|
(c) तीन जोड़ी।
प्रश्न 2.
(a) ग्लूकोस अणु के ऑक्सीकरण से ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में बीस्ट से क्या उत्पाद बनते हैं?
(b) मनुष्य के हृदय में कितने वेश्म होते हैं? इनमें सबसे बड़ा वेश्म कौन-सा है?
उत्तर :
(a) ऑक्सीजन की अनुपस्थिति (अनॉक्सी श्वसन) में यीस्ट में एथिल ऐल्कोहॉल (C2H5OH) तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का निर्माण होता है। कम मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।
(b) हृदय में चार वेश्म होते हैं। वायाँ निलय सबसे बड़ा वेश्म होता है।
प्रश्न 3.
(a) ATP, ADP तथा NADP का पूरा नाम लिखिए।
(b) मनुष्य के प्रत्येक जबड़े में अग्रचर्वणक दाँतों की संख्या बताइए तथा इनके कार्य लिखिए।
उत्तर :
(a) ATP-एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट।
ADP-एडीनोसीन डाइफॉस्फेट।
NADP-निकोटिनामाइड एडीनाइन डाइन्यूक्लियोटाइड फॉस्फेट।
(b) मनुष्य के प्रत्येक जबड़े में 4-4 अग्रचर्वणक होते हैं। ये भोजन को कुचलने तथा पीसने का कार्य करते हैं।
प्रश्न 4.
(a) कोशिकीय श्वसन किसे कहते हैं? एक ग्लूकोस अणु के पूर्ण ऑक्सीकरण से ATP के कितने अणु प्राप्त होते हैं?
अथवा श्वसन क्रिया को परिभाषित कीजिए तथा बताइए इस क्रिया में किस प्रकार ऊर्जा ATP में स्थानान्तरित होती है?
अथवा श्वसन को परिभाषित कीजिए।
(b) श्वसन क्रिया में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड के वाहक का नाम लिखिए।
उत्तर :
(a) कोशिकाओं में होने वाले ग्लूकोस के जैव रासायनिक ऑक्सीकरण को श्वसन या कोशिकीय श्वसन कहते हैं। यह एक अपचयी (catabolic) क्रिया है जो प्रायः ऑक्सीजन की उपस्थिति में सम्पन्न होती है। भोजन के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप मुक्त ऊर्जा ATP में संचित होती है। एक ग्लूकोस अणु के पूर्ण ऑक्सीकरण से 38 ATP अणु प्राप्त होते हैं।
(b) श्वसन क्रिया में O₂ का परिवहन हीमोग्लोबिन द्वारा तथा CO₂ का परिवहन मुख्यतया रक्त प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट आयनों के रूप में होता है। कुछ मात्रा में CO₂ भी हीमोग्लोबिन द्वारा वहन की जाती है।
प्रश्न 5.
(a) सौर ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन किस प्रक्रिया द्वारा होता है?
(b) वह कौन-सी क्रिया है जिसके द्वारा हरे पौधों की वायवीय सतह से जल का वाष्पीकरण होता है?
(c) पौधों में भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण करने वाले भाग का नाम लिखिए।
उत्तर :
(a) प्रकाश संश्लेषण द्वारा।
(b) वाष्पोत्सर्जन (transpiration)।
(c) फ्लोएम (phloem)।
प्रश्न 6.
(a) पित्त क्या है? यह कहाँ बनता है? इसके कार्य भी बताइए।
(b) अग्न्याशय रस में पाए जाने वाले दो एन्जाइम्स के नाम लिखिए।
उत्तर :
(a) पित्त एक हरे पीले रंग का क्षारीय तरल है जिसका उत्पादन यकृत में तथा संचय पित्ताशय में होता है। यह वसा का इमेल्सीकरण (वसा की बूदों को छोटे-छोटे भागों में तोड़ना) करता है ताकि उसका पाचन सुलभ हो जाए। साथ ही यह भोजन की अम्लीय pH को उदासीन कर उसे अग्न्याशयी एन्जाइमों की क्रिया हेतु क्षारीय बनाता है।
(b) (1) ट्रिप्सिन व (2) अग्न्याशयी लाइपेज।
प्रश्न 7.
(a) रुधिर में एन्टीजन तथा एन्टीबॉडी कहाँ पाए जाते हैं?
(b) रक्तदाब किसे कहते हैं?
उत्तर :
(a) रुधिर में (एन्टीजन) प्रतिजन लाल रुधिराणुओं की कोशा कला पर तथा (एन्टीबॉडी) प्रतिरक्षी रुधिर प्लाज्मा में पाया जाता है।
(b) रक्त द्वारा धमनियों की भित्ति पर लगाया जाने वाला द्रवस्थैतिक दाव ही रक्तदाब कहलाता है, जो हृदय की पम्पिंग से उत्पन्न होता है। मनुष्य का प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन रक्त दाब क्रमशः 120/80 मिमी Hg होता है।
प्रश्न 8.
(a) रुधिर वाहिनियाँ किसे कहते हैं? इनके प्रकार लिखिए।
(b) धमनी किसे कहते हैं? पल्मोनरी धमनी में किस प्रकार का रक्त पाया जाता है?
(c) हीमोग्लोबिन कहाँ पाया जाता है? इसका मुख्य कार्य बताइए।
उत्तर :
(a) बन्द परिवहन तन्त्र के अन्तर्गत शरीर में रक्त का वितरण एवं एकत्रीकरण करने वाली नलिकाओं को रुधिर वाहिनियाँ कहते हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं-
(1) रक्त का वितरण करने वाली धमनी एवं धमनिकाएँ
(2) रक्त को एकत्र करने वाली शिरिकाएँ तथा शिराएँ तथा
(3) रक्त केशिकाएँ। रक्त केशिकाएँ पदार्थों का आदान-प्रदान करती हैं।
(b) जो रुधिर वाहिनियाँ प्रायः शुद्ध रक्त को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगो में पहुँचाती हैं, उन्हें धमनी कहते हैं। पल्मोनरी धमनी में अशुद्ध रक्त पाया जाता है। यह एक अपवाद है।
(c) कशेरुकी प्राणियों की लाल रुधिराणुओं में हीमोग्लोबिन पाया जाता है। यह परिवहन (श्वसन) प्रोटीन है जो मुख्यतः 02 परिवहन का कार्य करता है। यह कुछ मात्रा में CO₂ का भी परिवहन करता है।
प्रश्न 9.
स्वपोषी पोषण क्या है? उदाहरण देकर संक्षेप में समझाइए।
अथवा स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं? उनके अन्तिम उत्पाद क्या हैं?
उत्तर :
जो जीवधारी सरल अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संश्लेषण स्वयं कर लेते हैं स्वपोषी कहलाते हैं और पोषण की इस प्रक्रिया को स्वपोषी पोषण कहते हैं।
स्वपोषी पोषण हेतु कच्चे माल के रूप में सरल अकार्बनिक पदार्थ (जैसे- CO₂ तथा H₂O), ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रकाश तथा इस प्रकाश ऊर्जा को ग्रहण कर रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने हेतु पर्णहरिम (chlorophyll) आवश्यक होता है।
हरे पौधे CO₂ तथा जल से पर्णहरित तथा सौर प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संश्लेषण कर लेते हैं। प्रकाश संश्लेषण में उत्पाद के रूप में कार्बनिक भोज्य पदार्थ (ग्लूकोस) तथा उपोत्पाद के रूप में ऑक्सीजन प्राप्त होते हैं। सायनोबैक्टीरिया (नीले-हरे शैवाल) तथा कुछ प्रकाश संश्लेषी जीवाणु भी स्वपोषी होते हैं।
प्रश्न 10.
तालाब में जहाँ जलीय पौधे अधिक होते हैं, जल की सतह पर बुलबुले उठते दिखायी देते हैं, क्यों?
उत्तर :
दिन के समय जलीय पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है। इस क्रिया में O₂ सहउत्पाद के रूप में मुक्त होती है। यह जल की सतह पर बुलबुलों के रूप में निकलती प्रतीत होती है।
प्रश्न 11.
(a) रन्ध्र (stomata) क्या हैं? इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।
(b) पौधों में वातरन्ध्रों की उपयोगिता का उल्लेख करें।
उत्तर :
(a) पादपों के हरे भागों विशेष रूप से पत्तियों की सतह पर पाए जाने वाले महीन छिद्र रन्ध्र कहलाते हैं। दो विशिष्ट रक्षक कोशिकाओं (guard cells) से घिरा प्रत्येक रन्ध्र (stoma) पादपों के लिए निम्न प्रकार उपयोगी है-
(1) रन्ध्र गैसीय विनिमय में सहायक हैं।
(2) वाष्पोत्सर्जन (transpiration) में सहायक होता है, जो रसारोहण व पत्तियों के ठण्डा बना रहने हेतु आवश्यक है।
(b) पौधों के काष्ठीय भागों (जैसे- पुराना तना, जड़ आदि) पर वातरन्ध्र (Lenticels) पाए जाते है। इनका निर्माण स्पंजी मृदूतक कोशिकाओं से होता है। इनके द्वारा पौधों के काष्ठीय भागों में गैसों का विनिमय तथा सूक्ष्म मात्रा में वाष्पोत्सर्जन होता है।
प्रश्न 12.
(a) यदि रुधिर में पट्टिकाएँ (platelets) न हों तो क्या होगा
(b) पल्मोनरी शिरा में किस प्रकार का रक्त बहता है?
उत्तर :
(a) रुधिर पट्टिकाएँ (blood platelets) रुधिर का थक्का बनाने में महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं अतः इनके अभाव में चोट लगने पर रुधिर का थक्का नहीं बनेगा।
(b) पल्मोनरी शिरा में शुद्ध रक्त बहता है।
प्रश्न 13.
लार में कौन-सा एन्जाइम पाया जाता है और वह किसका . पाचन करता है?
उत्तर :
लार में सेलाइवरी एमाइलेज (टायलिन) नामक पाचक एन्जाइम पाया जाता है जो मण्ड या स्टार्च (एक पॉलीसैकेराइड) को माल्टोज शर्करा (एक डाइसैकेराइड) में बदल देता हैं।
प्रश्न 14.
डायाफ्राम क्या है? यह कहाँ पाया जाता है?
उत्तर :
डायाफ्राम एक पेशीय पट्ट (septum) है जो वक्षगुहा को उदरगुहा से अलग करता है। डायाफ्राम की पेशियों के संकुचन व शिथिलन श्वास क्रिया (अन्तःश्वसन व बहिःश्वसन) में सहायता करते हैं।
प्रश्न 15.
विषमपोषी पोषण क्या है? इसका एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
वह जीव जो अपना भोजन स्वयं बनाने में असमर्थ होते है अतः बना बनाया कार्बनिक भोजन ग्रहण करते हैं विषमपोषी जीव तथा उनके द्वारा प्रदर्शित पोषण विषमपोषी पोषण (heterotrophic nutrition) कहलाता है। विषमपोषी जीव निम्न प्रकार के होते हैं-
(1) मृतजीवी (Saprotrophic) जैसे कवक, जीवाणु।
(2) परजीवी (Parasitic) जैसे एस्केरिस, अमरबेल।
(3) प्राणिसम (Holozoic) जैसे सभी-जन्तु अमीबा से हाथी, व्हेल आदि।
प्रश्न 16.
पित्त रस भोजन के पाचन में किस प्रकार सहायता करता है?
अथवा पित्त रस क्या है? यह रस कहाँ स्त्रावित और कहाँ एकत्र होता है?
अथवा पित्त रस क्या है? यह कहाँ बनता है? इसके कार्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
यकृत द्वारा स्रावित क्षारीय पाचक रस पित्त रस कहलाता है जिसका संग्रह पित्ताशय (Gall bladder) में होता है। इसका क्रियास्थल ग्रहणी है। पित्त रस आंतों के एन्जाइम हेतु भोजन के माध्यम को क्षारीय बनाता है। आमाशय से आयी लुगदी (chyme) को पतला करता है। पित्त लवण वसा का इमल्सीकरण (emulsification) करते हैं, जिससे वसा का पाचन सुगमता से हो जाता है।
प्रश्न 17.
श्वसन तथा श्वासोच्छ्वास में क्या अन्तर है?
उत्तर :
श्वसन तथा श्वासोच्छ्वास में अन्तर
| श्वसन | श्वासोच्छ्वास |
| यह एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है। | यह एक यान्त्रिक या भौतिक प्रक्रिया है। |
| यह एक अपचयी (catabolic) क्रिया है जिसमें भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है। | यह ऐसी क्रिया है जिसमें वातावरण से वायु श्वसनांगों (respiratory organs) तक पहुँचाई जाती है। |
| ऊर्जा मुक्त होती है। | ऊर्जा का प्रयोग होता है। |
| कार्बन डाइऑक्साइड, जल आदि बनते हैं, साथ ही ऊर्जा भी उत्पन्न होती है। | श्वसन सतह का (ventilation) वातन होता है। |
| कोशिका में सम्पन्न होता है। | कोशिका से बाहर सम्पन्न होता है। |
प्रश्न 18.
ऑक्सी तथा अनॉक्सी श्वसन में अन्तर लिखिए।
अथवा वायवीय एवं अवायवीय श्वसन में अन्तर लिखिए।
अथवा ऑक्सी तथा अनॉक्सी श्वसन में कोई दो अन्तर लिखिए।
उत्तर :
ऑक्सी तथा अनॉक्सी श्वसन में अन्तर
| क्र० सं० | ऑक्सी (वायवीय) श्वसन | अनॉक्सी (अवायवीय) श्वसन |
| 1. | इस क्रिया में ऑक्सीजन आवश्यक है। | इस क्रिया में ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती। |
| 2. | इस क्रिया के अन्त में CO2 व जल ही प्राप्त होते हैं। C6H12O6 + 602→ 6CO2↑ + 6H2O + 673 किलोकैलोरी | इस क्रिया के अन्त में यीस्ट से एथिल ऐल्कोहॉल व CO₂ बनता है। C6H12O6→2C2H5 OH 2CO2↑ + 21 किलोकैलोरी |
| 3. | इसमें ग्लूकोस अणु का पूर्ण विखण्डन हो जाता है। | इसमें ग्लूकोस अणु का आंशिक विखण्डन होता है। |
| 4. | अधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। | कम मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। |
| 5. | कोशिकाद्रव्य व माइटोकॉण्ड्यिा में पूर्ण होती है। | केवल कोशिकाद्रव्य में पूर्ण होती है। |
प्रश्न 19.
जैव क्रियाएँ किसे कहते हैं? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए। ये कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर :
किसी भी जीवित जीव या कोशिका में जीवित अवस्था बनाए रखने के लिए अणुओं को गतिशील बनाए रखा जाता है। कोशिका में ऊर्जा व पदार्थों का ‘इनपुट’ तथा ‘आउटपुट’ कोशिकीय संघटन में विघटन नहीं होने देता, यही अनुरक्षण (maintenance) कार्य है। वह सभी प्रक्रम जो सम्मिलित रूप से अनुरक्षण का कार्य करते हैं जैव प्रक्रम (क्रिया) कहलाते हैं। ये सभी मौलिक कार्य जीव की जीवित अवस्था बनाए रखने में सहायक होते हैं। पोषण, श्वसन, परिवहन व उत्सर्जन विभिन्न प्रकार की जैव क्रियाएँ हैं। जीवों (कोशिकाओं) में सम्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार की जैव रासायनिक क्रियाएँ (उपापचय) ही इन जैव क्रियाओं का आधार है। उपापचय – (Metabolism) निम्न दो प्रकार का होता है-
(क) अपचयी क्रियाएँ (Catabolic Reactions) – इन जैव क्रियाओं में जटिल कार्बनिक अणु सरल अणुओं में टूट जाते हैं, जैसे- पाचन, श्वसन आदि।
(ख) उपचयी क्रियाएँ (Anabolic Reactions) – इन जैव प्रक्रियाओंमें सरल कार्बनिक अणुओं से जटिल अणुओं का संश्लेषण होता है; जैसे-पौधों में प्रकाश संश्लेषण, जन्तुओं में प्रोटीन, वसा, न्यूक्लिक अम्ल आदि का संश्लेषण। उत्तेजनशीलता का गुण उद्दीपनों के प्रति यथोचित अनुक्रिया प्रदर्शित कर ‘जीवित अवस्था’ बनाए रखने में सहायता करता है। वृद्धि व जनन अनुरक्षण क्रियाएँ नहीं हैं।
प्रश्न 20.
दन्त क्षरण से क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
दाँत का खुला भाग, जो हम देख पाते हैं वह क्राउन कहलाता है। इनेमल (enamel) से ढके इस भाग के नीचे डेन्टीन (dentine) नामक पदार्थ का स्तर पाया जाता है जिसके बीच में पल्प केविटी (pulp cavity) होती है। इस चैनल जैसे भाग में रक्त वाहिकाएँ व तन्त्रिकाएँ पायी जाती हैं। इनेमल वैसे तो कठोरतम पदार्थ है लेकिंन यह अम्ल से घुल जाता है। दाँतों पर खाने के कण विशेषतः शुगर लगे रह जाने पर इस पर बैक्टीरिया पनपते हैं। यह खाने के कण व बैक्टीरिया दाँतों पर मैल या डेण्टल प्लाक (dental plaque) के रूप में पाए जाते हैं यही बैक्टीरिया अम्ल का निर्माण करते हैं जो इनेमल का क्षरण करता है। इनेमल से खनिज निकल जाने पर वह नरम हो जाता है। बाद में डेन्टीन भी इससे प्रभावित हो जाता है। गहरा क्षरण पल्प कैविटी तथा दाँतो की जड़ तक पहुँच जाता है। यही दन्त क्षरण है। समय से उपचार न कराने व ब्रश न करने से सूक्ष्मजीव पल्प में पहुँचकर संक्रमण व शोथ (infection and inflammation) कर देते हैं।
प्रश्न 21.
वृक्क के प्रमुख कार्य कौन-कौन से हैं? अथवा वृक्कों के दो मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
वृक्क के प्रमुख कार्य-वृक्क के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) ये हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों को रक्त से पृथक् करके उत्सर्जित करने में सहायक होते हैं। अतः ये उत्सर्जन अंग हैं।
(2) ये शरीर के अन्तः वातावरण में जल एवं लवण सन्तुलन को बनाए रखते हैं (परासरण नियमन)।
(3) ये रक्त दाब को नियन्त्रित करने में सहायक होते हैं।
प्रश्न 22.
उत्सर्जन किसे कहते हैं? मनुष्य के शरीर में कौन-कौन से उत्सर्जी अंग पाए जाते हैं?
उत्तर :
उत्सर्जन (Excretion) – शरीर में उपापचय क्रियाओं के फलस्वरूप बनने वाले हानिकारक नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन को उत्सर्जन कहते हैं। निम्नलिखित अंग उत्सर्जन में सहायता करते हैं-
(i) वृक्क (kidney) मुख्य उत्सर्जी अंग हैं। ये हानिकारक पदार्थों को रक्त से छानकर पृथक् कर लेते हैं और इन्हें मूत्र के रूप में त्याग दिया जाता है। वृक्क के साथ, मूत्र वाहिनी (ureter), मूत्राशय व मूत्र मार्ग उत्सर्जी तन्त्र के प्रमुख अंग हैं।
(ii) त्वचा (skin) उत्सर्जी पदार्थों को पसीने के रूप में मुक्त करती है (सहायक उत्सर्जी अंग)।
(iii) यकृत (liver) उपापचय के फलस्वरूप बने हानिकारक पदार्थों को कम हानिकारक पदार्थों में बदलकर उत्सर्जन में सहायता करता है। मनुष्य में यकृत अमोनिया को यूरिया (urea) में बदलता है।
प्रश्न 23.
रुधिर तथा लसीका में भिन्नता बताइए।
अथवा लसिका तथा रुधिर में कोई दो अन्तर लिखिए।
उत्तर :
रुधिर तथा लसीका में भिन्नता
| क्र०सं० | रुधिर | लसीका |
| 1. | रुधिर का रंग लाल होता है। | लसीका का रंग हल्का पीला या सफेद होता है। |
| 2. | रुधिर में लाल रुधिराणु पाए जाते हैं। | लसीका में लाल रुधिराणु नहीं पाए जाते हैं। |
| 3. | विलेय प्लाज्मा प्रोटीन अधिक होती है। न्यूट्रोफिल्स की संख्या अधिक होती है। | अविलेय प्लाज्मा प्रोटीन अधिक होती है। लिम्फोसाइट्स की संख्या अधिक होती है। |
| 4. | ऑक्सीजन तथा पोषक पदार्थ अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। | उत्सर्जी पदार्थों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। |
| 5. | प्रवाह द्विदिशीय व तीव्र होता है। | प्रवाह केवल हृदय की ओर (एकदिशीय) व धीमा होता है। |
प्रश्न 24.
धमनी और शिरा में चार अन्तर लिखिए।
उत्तर
धमनी और शिरा में अन्तर
| क्र०सं० | धमनी | शिरा |
| 1. | रुधिर सदैव हृदय से विपरीत दिशा में बहता है। | रुधिर सदैव हृदय की ओर बहता है। |
| 2. | हृदय स्पन्दन के कारण इसमें रुधिर रुक-रुककर तथा अधिक दबाव के साथ बहता है। | शिराओं में रुधिर बहाव की गति धीमी व एक-सी रहती है। |
| 3. | इनकी दीवारें अत्यधिक मोटी तथा लचीली होती हैं। | इनकी दीवारें पतली व कम लचीली होती हैं। |
| 4. | पल्मोनरी धमनी को छोड़कर सभी धमनियों में शुद्ध (ऑक्सीजनयुक्त) रुधिर होता है। | पल्मोनरी शिरा को छोड़कर सभी शिराओं में अशुद्ध (ऑक्सीजन- रहित) रुधिर होता है। |
| 5. | धमनियों में कपाट नहीं होते हैं। ये प्रायः गहराई में स्थित होती हैं। | शिराओं में स्थान-स्थान पर कपाट होते हैं। ये प्रायः त्वचा के नीचे स्थित होती हैं। |
प्रश्न 25.
वाष्पोत्सर्जन किसे कहते हैं? इस क्रिया को प्रभावित करने वाले चार कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा वाष्पोत्सर्जन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
वायवीय भागों
उत्तर :
वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) – पौधों के (प्रमुखतः पत्तियों) से जल वाष्प के रूप में होने वाली जल-हानि को वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। इसे प्रभावित करने वाले चार मुख्य बाह्य कारक निम्नलिखित हैं-
- प्रकाश की तीव्रता – प्रकाश की तीव्रता बढ़ने के साथ तापमान में वृद्धि और वायुमण्डलीय आर्द्रता कम हो जाती है। इसके कारण वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
- तापमान – वायुमण्डलीय ताप में वृद्धि होने के कारण वायु की आर्द्रता कम हो जाती है। वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। तापमान के कम होने पर – वाष्पोत्सर्जन की दर कम होती जाती है।
- वायु गति – स्थिर वायु में पौधे के समीपवर्ती क्षेत्र में आर्द्रता बढ़ जाती है तथा वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। वायु गति बढ़ जाने पर वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है।
- वायुमण्डलीय आर्द्रता- इसके कम होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है और अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।
प्रश्न 26.
बन्द तथा खुला रक्त परिसंचरण से क्या तात्पर्य है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
रक्त परिसंचरण निम्न दो प्रकार का होता है-
- बन्द प्रकार का रक्त परिसंचरण (Closed type blood circulation) – इसमें रक्त सदैव रक्त वाहिनियों (blood vessels) व हृदय मे बहता है। रक्त वाहिनियों के अन्तर्गत धमनियाँ, शिराएँ तथा रक्त केशिकाएँ आती हैं। पदार्थों का आदान-प्रदान रक्त केशिकाओं द्वारा होता है। रक्त वाहिकाओं में दाब के साथ बहता है तथा किसी अंग विशेष तक रक्त आपूर्ति आवश्यकतानुसार घटाई-बढ़ाई जा सकती है; जैसे- मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी तथा स्तनियों में।
- खुला प्रकार का रक्त परिसंचरण (Open type blood – circulation) – इसमें रक्त, ‘रक्त स्थानों (blood sinuses) में भरा होता है। ऊतक व अंग रक्त में डूबे रहते हैं। रक्त दाब का अभाव होता है क्योंकि रक्त वाहिकाओं तक सीमित नहीं रहता। रक्त को हीमोलिम्फ व शरीर गुहा को हीमोसील (haemocoel) कहा जाता है; जैसे – आथ्रोपोडा तथा मोलस्का संघ के – सदस्यों में।
प्रश्न 27.
हीमोग्लोबिन क्या है? यह कहाँ पाया जाता है? श्वसन क्रिया में इसकी क्या भूमिका है?
उत्तर :
हीमोग्लोबिन (haemoglobin) एक जटिल प्रोटीन है। इसका निर्माण लौहयुक्त वर्णक हीम (haem) तथा ग्लोबिन (globin) प्रोटीन से होता है। सभी पृष्ठवंशियों में यह लाल रुधिराणुओं में पाया जाता है। केंचुए तथा अपृष्ठवंशियों में यह रक्त प्लाज्मा में घुला होता है।
हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से मिलकर अस्थायी यौगिक ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है। कोशिकाओं तथा ऊतकों में पहुँचकर ऑक्सीहीमोग्लोविन विखण्डित होकर ऑक्सीजन को मुक्त कर देता है, यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। अतः हीमोग्लोविन श्वसन के O2 संवहन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कुछ मात्रा में CO₂ का भी परिवहन करता है।
प्रश्न 28.
विभिन्न रुधिर वाहिनियों के नाम तथा उनके कार्य लिखिए।
उत्तर :
कशेरुकी प्राणियों में रुधिर रुधिर वाहिनियों में बहता है। ये तीन प्रकार की होती हैं-
- धमनियाँ (Arteries) – ये हृदय से रुधिर को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाती हैं। इनकी भित्ति मोटी व लचीली होती है। धमनियों में रुधिर अत्यधिक दाब के साथ बहता है। धमनियों में शुद्ध रुधिर प्रवाहित होता है। धमनियों में कपाट (valves) नहीं पाए जाते हैं। धमनियों की छोटी शाखाओं को धमनिका (arteriole) कहते हैं।
- शिराएँ (Veins) – ये अंगों से रुधिर को वापस हृदय में लाती हैं। शिराओं की भित्ति महीन व पिचकने वाली होती है। शिराओं में अशुद्ध रुधिर बहुत कम दाब के साथ बहता है। शिराओं में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कपाट पाए जाते हैं जो रुधिर को एक ही दिशा में बहने देते हैं।
- केशिकाएँ (Capillaries) – ऊतकों में पहुँचकर धमनियों विभाजित होकर धमनिकाएँ बनाती हैं, फिर धमनिकाएँ महीन शाखाओं का जाल बनाती हैं, जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं। ये शिराओं और धमनियों को परस्पर जोड़ती हैं। केशिकाओं की भित्ति केवल अन्तःस्तर या एण्डोथीलियम की एक परत से बनी होती है। केशिकाओं में रुधिर प्रवाह की गति बहुत धीमी होती है। केशिकाएँ परस्पर मिलकर शिरिकाएँ (venules) और शिरिकाएँ मिलकर शिरा बनाती हैं।
प्रश्न 29.
पोषण के प्रकार बताइए। मृतोपजीवी तथा परजीवी पोषण में अन्तर बताइए।
अथवा पोषण क्या है? स्वपोषी पोषण की परिभाषा लिखिए। परपोषी पोषण कितने प्रकार का होता है, प्रत्येक का एक-एक उदाहरण भी लिखिए।
अथवा पोषण किसे कहते हैं? स्वपोषी पोषण व परपोषी पोषण का उपर्युक्त उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
अथवा स्वपोषी पोषण क्या है? उदाहरण देकर संक्षेप में समझाइए।
उत्तर :
पोषण (Nutrition) – वे समस्त क्रियाएँ जिनकी सहायता से जीवधारी भोज्य पदार्थों को ग्रहण करके कोशिकाओं के उपयोग हेतु बनाता है, पोषण कहलाती हैं। इसके अन्तर्गत भोजन का अन्तर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण तथा बहिःक्षेपण आदि क्रियाएँ आती हैं।
स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition) – जो जीवधारी सरल अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संश्लेषण स्वयं कर लेते हैं, स्वपोषी कहलाते हैं और पोषण की इस प्रक्रिया को स्वपोषी पोषण कहते हैं।
कुछ जीवाणु सरल अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक भोज्य पदार्थों के संश्लेषण हेतु ऊर्जा रासायनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं। इन्हें रसायन संश्लेषी (chemosynthetic) जीव कहा जाता है; जैसे-नाइट्रीफाइंग जीवाणु।
परपोषी पोषण तथा इनके प्रकार – जो जीवधारी बने बनाए कार्बनिक भोज्य पदार्थों को अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं परपोषी कहलाते हैं। ये निम्न प्रकारके होते हैं-
(i) प्राणिसमभोजी (Holozoic) – ये ठोस या तरल जटिल भोज्य पदार्थों को ग्रहण करते हैं; जैसे- अधिकांश प्राणी।
(ii) मृतपोषी (Saprobiotic) – ये सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं जैसे कवक, जीवाणु आदि मृतपोषी अवशोषी कहलाते हैं।
(iii) परजीवी (Parasites) – ये अन्य जीवित प्राणी या पादप से पोषण प्राप्त करते हैं; जैसे- ऐस्केरिस, फीताकृमि आदि।
मृतोपजीवी तथा परजीवी पोषण में अन्तर
| क्र०सं० | मृतोपजीवी पोषण | परजीवी पोषण |
| 1. | मृतोपजीवी सड़ी-गली वस्तुओं (मृत कार्बनिक पदार्थों) से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। | परजीवी अपना भोजन जीवित पोषद से प्राप्त करते हैं। |
| 2. | ये जटिल पदार्थों का शरीर से बाहर पाचन करके पचे भोज्य पदार्थों को अपनी सतह से अवशोषित कर लेते हैं। उदाहरण – कवक, जीवाणु आदि। | परजीवी में भोजन प्राप्त करने के लिए चूषकांग (haustoria) – होते हैं। इनकी सहायता से परजीवी पोषद के शरीर से सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। उदाहरण – पादप- अमरबेल, जन्तु – ऐस्केरिस । |
प्रश्न 30.
अमीबा में पोषण का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर :
अमीबा में पोषण (Nutrition in Amoeba) – एककोशिकीय अमीबा में भोजन ग्रहण करने के लिए कोई मुख नहीं होता। अमीबा सामान्यतया कूटपादों (pseudopodia) की सहायता से भोजन को अन्तर्ग्रहित (ingest) करता है। कूटपाद भोजन को चारों ओर से घेर लेते हैं और परस्पर मिलकर खाद्य रिक्तिका बनाते हैं।
खाद्य कण ● ↓ \ | / \ | / \ | / ┌───────────┐ ──►│ │◄── कूटपाद│ अमीबा │ कूटपाद │ │ │ ○ │ │ खाद्य │ │ रिक्तिका │ └───────────┘ ↓ अपचित पदार्थ बाहर
खाद्य रिक्तिका में भोजन का पाचन होता है। पचे हुए भोज्य पदार्थ विसरण द्वारा कोशाद्रव्य में पहुँचकर आत्मसात हो जाते हैं। इसे अवशोषण व स्वांगीकरण कहते हैं।
अपचित भोज्य पदार्थों के रिक्तिका में शेष रह जाने पर खाद्य रिक्तिका शरीर सतह पर पहुँचकर फट जाती है। इस क्रिया को बहिःक्षेपण कहते हैं।
प्रश्न 31.
श्वसन तथा दहन में चार अन्तर लिखिए।
उत्तर :
श्वसन तथा दहन में अन्तर
| क्र० सं० | श्वसन | दहन |
| 1. | यह एक जैविक क्रिया है। | यह एक रासायनिक क्रिया है। |
| 2. | इस क्रिया में ऊर्जा विभिन्न चरणों में निकलती है। | इस क्रिया में ऊर्जा एक-साथ निकलती है। |
| 3. | शरीर का तापमान सामान्य बना रहता है। | तापमान में अत्यधिक वृद्धि होती है। |
| 4. | ऊर्जा ATP के रूप में संचित होती है | ऊर्जा ऊष्मा एवं प्रकाश के रूप में निकलती है। |
| 5. | सम्पूर्ण क्रिया विभिन्न विकरों द्वारा सामान्य ताप पर सम्पन्न होती है। | सम्पूर्ण क्रिया उच्च ताप पर सम्पन्न होती है। |
प्रश्न 32.
नामांकित चित्र की सहायता से दिखाइए कि प्रकाश संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल आवश्यक है?
उत्तर :
प्रकाश संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल की आवश्यकता का प्रदर्शन – क्रोटन (Croton) अथवा कोलियस के पौधे को 48 घण्टे तक अन्धकार में रखकर स्टार्चविहीन कर लेते हैं। इस पौधे की शबलित (varigated) पत्ती के पर्णहरिमयुक्त भागों को चिह्नित कर देते हैं। इसके पश्चात् पौधे को कुछ समय के लिए धूप में रख देते हैं। धूप में रखे पौधे की एक पत्ती को तोड़कर इसका आयोडीन परीक्षण करते हैं।
चितकबरा (Variegated) पत्ता _________ / \ / हरा भाग \ | (क्लोरोफिल) | | ✓ | | | \ सफेद भाग / \ (क्लोरोफिल / \ नहीं) / \_______/
आयोडीन परीक्षण के बाद
_________ / \ / गहरा नीला- \ | काला भाग | | (स्टार्च) | | | \ भूरा भाग / \ (स्टार्च / \ नहीं) / \_______/
प्रयोग
- एक चितकबरा (Variegated) पत्ता लें।
- पौधे को कुछ समय अंधेरे में रखने के बाद धूप में रखें।
- पत्ते को तोड़कर पानी तथा अल्कोहल में उबालकर क्लोरोफिल हटाएँ।
- पत्ते पर आयोडीन विलयन डालें।
अवलोकन
- पत्ते का हरा भाग नीला-काला हो जाता है, जो स्टार्च की उपस्थिति दर्शाता है।
- सफेद भाग का रंग नहीं बदलता, क्योंकि वहाँ स्टार्च नहीं बनता।
निष्कर्ष
पत्ते के केवल हरे भाग में ही प्रकाश संश्लेषण हुआ और स्टार्च बना। इसलिए सिद्ध होता है कि प्रकाश संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल आवश्यक है।
प्रश्न 33.
पादपों में जल एवं खनिज तथा खाद्य उत्पादों के संवहन हेतु पायी जाने वाली वाहिनियों का वर्णन कीजिए और उनके नाम बताइए।
उत्तर :
पादपों में जल एवं खनिज का संवहन जाइलम की वाहिनिकाओं (tracheids) तथा वाहिकाओं (vessels) से होता है। ये लम्बी, सँकरी एवं स्थूलित भित्ति वाली मृत नलिकाएँ होती हैं।
पादपों में खाद्य उत्पादों का संवहन फ्लोएम की, चालनी नलिकाओं द्वारा होता है। ये पतली भित्ति वाली, चौड़ी गुहा वाली जीवित नलिकाएँ होती हैं। परिपक्व होने पर इनका केन्द्रक नष्ट हो जाता है। इनके साथ पायी जाने वाली सहचर कोशिकाएँ (companion cells) खाद्य स्थानान्तरण में सहायक होती हैं।
प्रश्न 34.
अवशोषण तथा स्वांगीकरण में क्या अन्तर है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर :
अवशोषण तथा स्वांगीकरण में अन्तर- भोजन के पाचन के बाद पाचन के (सरल, विलेय व छोटे-छोटे अणुओं से बने) उत्पाद आँत की भित्ति को पारकर रक्त में प्रवेश कर जाते हैं। इन सरल अणुओं का शरीर में प्रवेश करना ही अवशोषण कहलाता है।
दूसरी ओर, अवशोषित पचे हुए भोज्य पदार्थों के कोशिका के जीवद्रव्य में पहुँचने के पश्चात् जीवद्रव्य में आत्मसात हो जाने की क्रिया को स्वांगीकरण कहते हैं। इनका शरीर की वृद्धि/विकास या ऊर्जा प्राप्त करने में उपयोग हो सकता है।
प्रश्न 35.
श्वसन से आप क्या समझते हैं? यह क्रिया कितने चरणों में पूर्ण होती है? इसमें कुल कितने ATP अणु प्राप्त होते हैं?
उत्तर :
श्वसन (Respiration) – कोशिकाओं में भोज्य पदार्थों (मुख्यतः ग्लूकोस) के जैव रासायनिक ऑक्सीकरण द्वारा ऊर्जा मुक्त करने की क्रिया को श्वसन कहते हैं।
ऑक्सीश्वसन क्रिया मुख्यतः निम्न दो चरणों में पूर्ण होती है-
(1) ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis)
(2) क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle)
वायवीय श्वसन में कुल 38 अणु ATP के प्राप्त होते हैं।
प्रश्न 36.
मानव हृदय का नामांकित चित्र बनाइए
उत्तर :









