निन्दा रस – Ninda Ras| Up Board Class 12th Hindi

(1) मेरे मन में गत रात्रि के उस निन्दक मित्र के प्रति मैल नहीं रहा। दोनों एक हो गए। भेद तो रात्रि के अन्धकार में ही मिटता है, दिन के उजाले में भेद स्पष्ट हो जाते हैं। निन्दा का ऐसा ही भेदनाशक अँधेरा होता है। तीन-चार घण्टे बाद, जब वह विदा हुआ तो हम लोगों के मन में बड़ी शान्ति और तुष्टि थी।

प्रसंग- यहाँ विरोधियों की निन्दा करने में मिले आनन्द का व्यंग्यात्मक चित्रण किया गया है।

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व्याख्या- लेखक कहता है कि मेरा निन्दक मित्र जब तक अपने परिचितों की निन्दा करता रहा, तब तक उसका व्यवहार मुझे उचित नहीं लगा लेकिन जब उसने मेरे विरोधियों की निन्दा करनी प्रारम्भ की, तब उसके प्रति मैं विनम्र हो गया; क्योकि दोनों की भावनाएँ समान हो गईं और हमारा स्वाभाविक भेदभाव भी समाप्त हो गया; क्योंकि इस प्रकार के भेद दोषरूपी अन्धकार में दिखाई नहीं देते और स्वच्छ आचरणरूपी दिन में स्पष्ट हो जाते हैं। निन्दा की वैचारिक समानता के कारण लोगों के मन शान्त एवं तृप्त हो ही जाते हैं; यही कारण है कि दो निन्दक मित्र वैचारिक भिन्नता होने पर भी अपने-अपने विरोधियों की निन्दा एक-दूसरे से सुनते समय आपस में सहानुभूति का परिचय देते हैं।

प्रश्न-

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ग) लेखक के मन में निन्दक मित्र के प्रति मैल क्यों नहीं रहा?

(घ) दो व्यक्तियों द्वारा किसी अन्य की निन्दा करने से उत्पन्न वैचारिक समानता का दोनों पर क्या प्रभाव होता है?

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में परस्पर किसकी तुलना की गई है?

उत्तर-

(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उधृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।

(ख) उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ग) लेखक के मन में अपने निन्दक मित्र के प्रति मैल इसलिए नहीं रहा; क्योंकि जब उसने मेरे विरोधियों की निन्दा करनी प्रारम्भ कर दी तब तो मेरे मन में उसके प्रति कोई दुर्भावना नहीं रह गई। उस समय हम दोनों की भावनाएँ समान हो गई और हमारा स्वाभाविक भेदभाव भी समाप्त हो गया।

(घ) दो व्यक्तियों द्वारा किसी अन्य की निन्दा करने से उत्पन्न वैचारिक समानता का दोनों पर यह प्रभाव होता है कि दोनों के मन शान्त और तृप्त हो जाते हैं। वे अपने विरोधियों की निन्दा एक-दूसरे से सुनते हुए आपस में सहानुभूति का परिचय देते हैं।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में रात्रि के अन्धकार की दोषों से और दिन के उजाले की स्वच्छ आचरण से तुलना की गई है।

(2) कुछ ‘मिशनरी’ निन्दक मैंने देखे हैं। उनका किसी से बैर नहीं, द्वेष नहीं। वे किसी का बुरा नहीं सोचते। पर चौबीसों घण्टे वे निन्दा कर्म में बहुत पवित्र भाव से लगे रहते हैं। उनकी नितान्त निर्लिप्तता, निष्पक्षता इसी से मालूम होती है कि वे प्रसंग आने पर अपने बाप की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं, जिस आनन्द से अन्य लोग दुश्मन की। निन्दा इनके लिए ‘टानिक’ होती है।

प्रसंग- लेखक ने इन पंक्तियों में निन्दकों के व्यवहार का वर्णन किया है।

व्याख्या- प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि कुछ निन्दक मिशनरी प्रचारकों (ईसाई धर्म के प्रचारकों) की तरह निर्लिप्त भाव से अपना कर्त्तव्य करते हैं। उनकी यह निन्दा इस कारण नहीं होती कि उनका किसी से ईर्ष्या-द्वेष है, वे तो उसे एक पवित्र कर्त्तव्य समझकर करते हैं और समय आने पर अपने पिता की भी निन्दा उसी तन्मयता से करते हैं, जितनी तन्मयता से अन्य लोग अपने किसी दुश्मन की। यहाँ लेखक यह कहना चाहता है कि कुछ लोग केवल अपने स्वभाववश ही निन्दा कर्म में प्रवृत्त रहते हैं, इसके पीछे उनका कोई उद्देश्य नहीं होता।

प्रश्न-

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ग) प्रस्तुत गद्यांश में ‘मिशनरी’ निन्दक से क्या तात्पर्य है?

(घ) मिशनरी निन्दक किस भाव से निन्दा करने में लगे रहते हैं?

(ङ) निन्दा करनेवाले लोग दुश्मन की पगड़ी उछालने के साथ ही और किसकी पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं?

उत्तर-

(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उधृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।

(ख) उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ग) प्रस्तुत गद्यांश में ‘मिशनरी’ निन्दक का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ईसाई मिशनरी या प्रचारक निर्लिप्त भाव से अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार मिशनरी निन्दक भी निन्दा करना अपना पुनीत कर्त्तव्य समझते हैं।

(घ) मिशनरी निन्दक ईसाई धर्म-प्रचारकों की तरह निर्लिप्त भाव से धर्म प्रचार करने की भावना की तरह निन्दा को अपना पुनीत कर्त्तव्य समझकर दूसरों की निन्दा करते हैं।

(ङ) निन्दा करनेवाले लोग दुश्मन की पगड़ी उछालने के साथ ही समय आने पर अपने पिता की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं, जिस प्रकार अपने किसी दुश्मन की। वे अपने पिता की बुराई भी पूरी तन्मयता से करते हैं।

(3) ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा भी होती है। लेकिन इसमें वह मजा नहीं, जो मिशनरी भाव से निन्दा करने में आता है। इस प्रकार का निन्दक बड़ा दुःखी होता है। ईर्ष्या-द्वेष से चौबीसों घंटे जलता है और निन्दा का जल छिड़ककर कुछ शान्ति अनुभव करता है। ऐसा निन्दक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करनेवाले को कोई दण्ड देने की जरूरत नहीं है। वह निन्दक बेचारा स्वयं दण्डित होता है। आप चैन से – सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दण्ड चाहिए?
ईर्ष्या-द्वेष से भौंकता है। इस प्रकार दण्डित होता है। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित जरूरत नहीं है।

प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश में ईर्ष्या द्वेष के कारण निन्दा करनेवाले निन्दकों की दयनीय स्थिति का अत्यन्त मार्मिक वर्णन व्यंग्यात्मक शैली में किया गया है।

व्याख्या- परसाईजी के अनुसार निन्दक दो प्रकार के होते हैं- प्रथम, मिशनरी निन्दक अर्थात् जिनका स्वभाव ही निन्दा करने का हो और दूसरे, ईर्ष्या- द्वेष से प्रेरित निन्दक। मिशनरी निन्दको के लिए निन्दा टॉनिक का कार्य करती है, किन्तु ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक अत्यधिक पीड़ित होता है। वह निरन्तर द्वेष की भावना से जलता रहता है, वह निन्दारूपी जल के माध्यम से अपने आपको तृप्त करता है। निन्दक की यह दशा बड़ी दयनीय होती है। अपने अभावों के कारण वह दुःखी होता हुआ जिस प्रकार कुत्ता रात्रि के अन्धकार को देखकर भौंकता रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण रात्रि ईर्ष्या की अग्नि में जलता रहता है। इस प्रकार ईर्ष्या से प्रभावित व्यक्ति को दण्ड की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही अपनी प्रकृति के कारण दुःख प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार की उन्नति की अपेक्षा दुःख के भागी होते हैं। ऐसे व्यक्ति को दण्ड देने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि आप तो सुख से चैन की नींद सोते हैं और वह निन्दक ईर्ष्या की पीड़ा के कारण एक भी पल को चैन से सो नहीं पाता। अब भला इससे अधिक कठोर और कौन-सा दण्ड इस व्यक्ति को दिया जा सकता है।

प्रश्न-

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ग) लेखक के अनुसार दो प्रकार के निन्दक कौन-से होते हैं?

(घ) परसाईजी के अनुसार ईर्ष्या द्वेष की अग्नि में जलनेवाले निन्दक की स्थिति किस प्रकार दयनीय होती है?

(ङ) ईर्ष्या से प्रभावित व्यक्ति को किसी दण्ड की आवश्यकता क्यों नहीं होती?

उत्तर-

(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उधृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।

(ख) उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ग) लेखक के अनुसार निन्दक दो प्रकार के होते हैं- प्रथम मिशनरी निन्दक; अर्थात् जिनका स्वभाव ही निन्दा करने का हो और दूसरे ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक।

(घ) परसाईजी के अनुसार ईर्ष्या द्वेष की अग्नि में जलनेवाले निन्दक की स्थिति इस दृष्टि से दयनीय होती है कि वह अपने अभावों के कारण दुःखी होता हुआ, जिस प्रकार कुत्ता रात्रि के अन्धकार को देखकर भौंकता रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण रात्रि ईर्ष्या की अग्नि में जलता रहता है।

(ङ) ईर्ष्या से प्रभावित व्यक्ति को किसी दण्ड की आवश्यकता इसलिए नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही अपनी प्रकृति के कारण दुःख प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी प्रकार की उन्नति की अपेक्षा दुःख के ही भागी होते हैं। उन्हें दण्ड देने की आवश्यकता इसलिए भी नहीं होती; क्योंकि जब दूसरे सुख की नींद सोते हैं, तब वे निन्दक ईर्ष्या की पीड़ा के कारण एक भी पल चैन की नींद नहीं सो पाते।

(4) निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईर्ष्या-द्वेष और इनसे उत्पन्न निन्दा को मारता है। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है; क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे-बनाया महल और बिन-बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से उन्हें ईर्ष्या होती है। निन्दा का उद्गम मारता है। निन्दा का उद्गम बढ़ती जाती है।

प्रसंग- परसाईजी ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य में दीनता का भाव उत्पन्न हो जाने पर वह अकर्मण्य हो जाता है। परिणामतः वह दूसरों की निन्दा करना आरम्भ कर देता है।

व्याख्या- मनुष्य के हीन भाव और उसकी कर्महीनता से निन्दा का जन्म होता है। जब व्यक्ति में हीनता की भावना प्रवेश कर जाती है तो वह आलसी हो जाता है और उसकी कर्म-शक्ति क्षीण हो जाती है। तब वह निन्दा का सहारा लेकर स्वयं को ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है और अपनी हीनता को छिपाने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार का व्यक्ति आत्महीनता के बोझ से दबा रहता है। हीनभावना से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके तथा उन्हें तुच्छ और निकृष्ट बताकर अपने अहम् की तुष्टि करते हैं। वे समझते हैं कि इस प्रकार वे समाज में अपने महत्त्व की स्थापना कर रहे हैं। उनका यह प्रयास ऐसा ही है, जैसे कोई व्यक्ति बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर अपनी छोटी लकीर को बड़ी लकीर समझने लगे। जैसे-जैसे व्यक्ति कर्महीन होता जाता है, वैसे-वैसे उसमें निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती चली जाती है। कर्मठ व्यक्ति में न तो ईर्ष्या और द्वेष का भाव होता है और न उसमें निन्दा की प्रवृत्ति होती है। वस्तुतः अपनी कर्मशीलता के क्षणों में उसे इन बातों का ध्यान भी नहीं रहता। स्वर्ग का देवता इन्द्र सबसे बड़ा ईर्ष्यालु है। इसका कारण यह है कि उसे कोई काम नहीं करना पड़ता। खाली पड़े-पड़े दूसरों से ईर्ष्या करना ही उसका कार्य है। स्वर्ग में सबकुछ बिना परिश्रम के मिल जाता है। कर्महीनता की इस स्थिति में इन्द्र को यह भय बना रहता है कि कोई उसके साधनों को न छीन ले और उसकी प्रतिष्ठा मिट्टी में न मिल जाए। इसीलिए जैसे ही वह किसी व्यक्ति को पुरुषार्थ करते हुए देखता है, उसके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न-

(क) निन्दा की प्रवृत्ति कब बढ़ती है?

(ख) निन्दा का उद्गम कैसे होता है?

(ग) ‘अकर्मण्यता’ और ‘द्वेष’ का अर्थ क्या है?

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।

उत्तर-

(क) कर्म के क्षीण होने पर निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती है।

(ख) निन्दा का उद्गम हीनता और कमजोरी से होता है।

(ग) ‘अकर्मण्यता’ का अर्थ ‘कर्महीनता’ और ‘द्वेष’ का अर्थ है ‘वैर का भाव’।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या के लिए उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ङ) पाठ का शीर्षक – निन्दा रस। लेखक- हरिशंकर परसाई।

( 5) निन्दा कुछ लोगों की पूँजी होती है। बड़ा लम्बा-चौड़ा व्यापार फैलाते हैं वे इस पूँजी से। कई लोगों की प्रतिष्ठा ही दूसरों की कलंक-कथाओं के पारायण पर आधारित होती है। बड़े रस-विभोर होकर वे जिस-तिस की सत्य-कल्पित कलंक-कथा सुनाते हैं और स्वयं को पूर्ण सन्त समझने की तुष्टि का अनुभव करते हैं।

प्रसंग- यहाँ निन्दा करनेवाले व्यक्तियों की प्रकृति और आचरण का व्यंग्यात्मक चित्रण किया गया है।

व्याख्या- निन्दा करनेवाले व्यक्तियों के विचित्र स्वभाव पर व्यंग्य करते हुए परसाईजी कहते हैं कि कुछ लोग निन्दा को उसी प्रकार महत्त्व देते हैं, जैसे व्यापारी अपनी पूँजी को। वे निन्दा को पूँजी समझते हुए ही अपना व्यापार बढ़ाने में लगे रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अधिक-से-अधिक और सर्वत्र निन्दा करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य होता है। उनकी यह धारणा होती है कि वे जितनी अधिक निन्दा करेंगे, उतने ही अधिक लाभ उन्हें प्राप्त होंगे। कुछ लोगों को तो प्रतिष्ठित होने का अवसर भी इसीलिए प्राप्त हो पाता है कि वे दूसरों की निन्दा करने में कुशल होते हैं। वे दूसरों की निन्दा करने में उसी प्रकार तल्लीन हो जाते हैं, जैसे ‘रामायण’ का पाठ करनेवाला व्यक्ति रामायण पढ़ने में। ऐसे निन्दक अत्यन्त रुचिपूर्वक दूसरों के जीवन से सम्बन्धित कलंकपूर्ण घटनाओं को सुनायां करते हैं। कभी-कभी तो निन्दा रस में रुचि लेनेवाले लोग मात्र कल्पना के आधार पर ही किसी को बदनाम कर दिया करते हैं। दूसरों के प्रति ऐसा वास्तविक, किन्तु काल्पनिक दुष्प्रचार करके वे स्वयं को सन्त समझने और स्वयं के अहम् की तुष्टि करने का ही प्रयास करते हैं। दूसरों की निन्दा करके वे भ्रमवश ऐसा अनुभव करने लगते हैं कि अन्य व्यक्तियों की तुलना में वे बहुत अधिक श्रेष्ठ हैं।

प्रश्न-

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ग) कुछ लोग निन्दा को किस प्रकार महत्त्व देते हैं?

(घ) निन्दा को अपनी पूँजी समझकर निन्दक प्रवृत्ति के लोग क्या करते हैं?

(ङ) निन्दक दूसरों की निन्दा करने में किस प्रकार तल्लीन हो जाते हैं?

(च) दूसरों के प्रति काल्पनिक दुष्प्रचार करके निन्दक स्वयं को क्या समझने लगते हैं?

उत्तर-

(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उधृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।

(ख) उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ग) कुछ लोग निन्दा को इसी प्रकार महत्त्व देते हैं, जिस प्रकार व्यापारी अपनी पूँजी को महत्त्व देता है।

(घ) निन्दा को अपनी पूँजी समझकर निन्दक-प्रवृत्ति के लोग अपना व्यापार बढ़ाने में लगे रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अधिक-से-अधिक और सर्वत्र निन्दा करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य होता है। उनकी यह धारणा होती है कि वे जितनी अधिक निन्दा करेंगे, उतने ही अधिक लाभ उन्हें प्राप्त होंगे।

(ङ) निन्दक दूसरों की निन्दा करने में इसी प्रकार तल्लीन हो जाते हैं, जैसे सन्त भगवान् का भजन करते समय तल्लीन होता है।

(च) दूसरों के प्रति काल्पनिक दुष्प्रचार करके निन्दक स्वयं को सन्त समझते हुए अपने अहं की तुष्टि करते हैं।

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