जीवन परिचय
हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार, पत्रकार, व्यंग्यकार और समाज सुधारक प्रताप नारायण मिश्र का जन्म 24 सितंबर 1856 ई० को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बैजेगाँव (बैसवाड़ा क्षेत्र) में हुआ था। उनके पिता का नाम पं० दीनदयाल मिश्र था। उनका परिवार संस्कारी, धार्मिक और मध्यमवर्गीय था।
उनका बचपन गाँव के साधारण और प्राकृतिक वातावरण में बीता। गाँव की सादगी, सामाजिक जीवन और भारतीय संस्कृति का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी, चंचल, जिज्ञासु और प्रतिभाशाली स्वभाव के थे। उन्हें प्रारम्भ से ही पढ़ने-लिखने, भाषा, साहित्य और व्यंग्य में विशेष रुचि थी। वे अपने आसपास की घटनाओं और समाज की परिस्थितियों को बहुत ध्यान से देखते थे और उन पर अपने विचार व्यक्त करते थे। उनके स्वभाव में हास्य और व्यंग्य की प्रवृत्ति भी बचपन से ही विकसित होने लगी थी।
शिक्षा
प्रताप नारायण मिश्र की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव और स्थानीय विद्यालयों में हुई। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी और जिज्ञासु छात्र थे। उन्हें हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा में विशेष रुचि थी। उन्होंने संस्कृत साहित्य और भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन किया। औपचारिक उच्च शिक्षा वे पूरी नहीं कर पाए, लेकिन स्वाध्याय (Self Study) के माध्यम से उन्होंने साहित्य, इतिहास और समाज का व्यापक ज्ञान प्राप्त किया।
कार्य जीवन
प्रताप नारायण मिश्र ने अपने कार्य जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की। वे हिंदी पत्रकारिता के विकास में सक्रिय रहे और “ब्राह्मण” पत्रिका के संपादक भी बने। पत्रकार के रूप में उन्होंने समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर तीखा व्यंग्य किया तथा लोगों में जागरूकता फैलाने का कार्य किया। वे सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना के समर्थक थे।
उनका कार्य जीवन मुख्य रूप से साहित्य लेखन, पत्रकारिता और समाज सुधार को समर्पित रहा। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से हिंदी गद्य को सरल, प्रभावशाली और व्यंग्यात्मक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साहित्यिक जीवन एवं योगदान
प्रताप नारायण मिश्र भारतेन्दु युग के प्रमुख साहित्यकार थे। वे हिंदी निबंध, व्यंग्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को सरल, रोचक और व्यंग्यपूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाओं में समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर तीखा व्यंग्य मिलता है। वे समाज सुधार और राष्ट्रीय चेतना के समर्थक थे। उनकी लेखनी में हास्य और व्यंग्य के साथ-साथ गंभीर सामाजिक संदेश भी मिलता है। उन्होंने हिंदी निबंध साहित्य को नई दिशा दी और उसे जनसामान्य के निकट पहुँचाया।
प्रमुख रचनाएँ
- कलिकाता काली
- बुढ़ापा
- तृण सागर
- प्रेम पत्र
- निबंध संग्रह
भाषा-शैली
प्रताप नारायण मिश्र की भाषा सरल, सहज और बोलचाल की खड़ी बोली हिंदी है। उन्होंने अपनी रचनाओं में लोकभाषा और ग्रामीण शब्दों का भी प्रभावशाली प्रयोग किया है, जिससे उनकी भाषा अधिक स्वाभाविक और जीवंत बन गई है। उनकी शैली मुख्यतः हास्य-व्यंग्यात्मक, वर्णनात्मक और सुधारवादी है। वे समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर व्यंग्य करते हुए पाठकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। उनकी भाषा में स्पष्टता, रोचकता और प्रभावशीलता दिखाई देती है, जिसके कारण उनकी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली मानी जाती हैं।
व्यक्तित्व और जीवन-दर्शन
प्रताप नारायण मिश्र का व्यक्तित्व सरल, स्पष्टवादी और व्यंग्यप्रिय था। वे स्वभाव से चंचल, जिज्ञासु और अत्यंत प्रतिभाशाली थे। उनके व्यक्तित्व में हास्य और व्यंग्य की विशेष प्रवृत्ति थी, जिसके कारण वे समाज की कुरीतियों पर तीखा प्रहार करने में सक्षम थे।
वे सामाजिक सुधार, देशभक्ति और भारतीय संस्कृति के समर्थक थे। उनका जीवन-दर्शन यह था कि साहित्य का मुख्य उद्देश्य समाज को जागरूक करना और उसमें सुधार लाना है। वे अंधविश्वासों, रूढ़ियों और सामाजिक बुराइयों के विरोधी थे। उनका जीवन साहित्य, पत्रकारिता और समाज सुधार को समर्पित रहा।
साहित्य में स्थान
प्रताप नारायण मिश्र हिंदी साहित्य के भारतेन्दु युग के प्रमुख निबंधकार, पत्रकार और व्यंग्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को सरल, रोचक और व्यंग्यात्मक बनाकर उसे नई दिशा प्रदान की। उनकी रचनाओं में समाज सुधार, देशभक्ति और सामाजिक कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य मिलता है। वे हिंदी निबंध और हास्य-व्यंग्य साहित्य के महत्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं।
निधन
प्रताप नारायण मिश्र का निधन 6 जुलाई 1894 ई० को हुआ।








