प्रस्तावना
हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध व्यंग्यकार, निबंधकार और कथाकार थे। उन्होंने हिंदी व्यंग्य साहित्य को नई पहचान और ऊँचाई प्रदान की। उनकी रचनाओं में समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, पाखंड और राजनीतिक अव्यवस्थाओं पर तीखा व्यंग्य मिलता है। वे सरल, प्रभावशाली और जनभाषा के लेखक थे।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 ई० को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति अधिक अच्छी नहीं थी, इसलिए उनका बचपन अभावों और संघर्षों में बीता। बचपन से ही वे अत्यंत जिज्ञासु, संवेदनशील और अध्ययनशील स्वभाव के थे। वे समाज में होने वाली घटनाओं और लोगों के व्यवहार को ध्यान से देखते थे। गाँव के सामान्य जीवन, गरीबी, सामाजिक असमानता, पाखंड और अन्याय का उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यही अनुभव आगे चलकर उनके साहित्य और व्यंग्य लेखन की प्रमुख विशेषता बने।
हरिशंकर परसाई का प्रारंभिक जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। कम आयु में ही उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ा, जिससे उनके व्यक्तित्व में गंभीरता और संघर्षशीलता आ गई। वे बचपन से ही सच बोलने वाले, स्पष्टवादी और अन्याय के विरोधी थे।
शिक्षा
हरिशंकर परसाई की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई। बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी, जिज्ञासु और अध्ययनशील थे। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। आगे की शिक्षा के लिए वे नागपुर गए, जहाँ उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में एम०ए० की उपाधि प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन से ही उनकी रुचि साहित्य, समाज और राजनीति की ओर बढ़ने लगी थी।
कार्य जीवन
हरिशंकर परसाई ने अपने कार्य जीवन की शुरुआत अध्यापन कार्य से की। कुछ समय तक उन्होंने विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य किया, लेकिन उनका मन साहित्य और लेखन में अधिक लगता था। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूर्ण रूप से साहित्य साधना तथा लेखन कार्य में लग गए। वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन कार्य से भी जुड़े रहे। उन्होंने जबलपुर से “वसुधा” नामक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन और संपादन किया।
उनका जीवन संघर्षपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी लेखन कार्य नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने साहित्य और व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों, भ्रष्टाचार, पाखंड और राजनीतिक विसंगतियों के विरुद्ध आवाज उठाई।
साहित्यिक जीवन एवं योगदान
हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकार, निबंधकार और कथाकार थे। उन्होंने हिंदी व्यंग्य साहित्य को नई पहचान और ऊँचाई प्रदान की। उनकी रचनाओं में समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, पाखंड, अंधविश्वास और राजनीतिक स्वार्थों पर तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है। उन्होंने व्यंग्य को केवल हँसी-मजाक का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसे समाज सुधार और जनजागरण का सशक्त साधन बनाया। उनकी रचनाएँ पाठकों को हँसाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती हैं।
हरिशंकर परसाई ने निबंध, कहानी, संस्मरण और व्यंग्य आदि अनेक विधाओं में लेखन किया। उनकी भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली है। उन्होंने सामान्य जनजीवन की समस्याओं और समाज की वास्तविकताओं को अपनी रचनाओं में अत्यंत जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
प्रमुख रचनाएँ
- विकलांग श्रद्धा का दौर
- सदाचार का ताबीज
- प्रेमचंद के फटे जूते
- भोलाराम का जीव
- निठल्ले की डायरी
- वैष्णव की फिसलन
- इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर
भाषा-शैली
हरिशंकर परसाई की भाषा सरल, सहज, व्यंग्यपूर्ण और प्रभावशाली है। उन्होंने अपनी रचनाओं में बोलचाल की भाषा तथा जनभाषा के शब्दों का सुंदर प्रयोग किया है, जिससे उनका साहित्य अत्यंत रोचक और जीवंत बन गया है। उनकी शैली हास्य-व्यंग्य प्रधान, यथार्थवादी और विचारात्मक है। वे समाज की बुराइयों, भ्रष्टाचार, पाखंड और राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करते हैं। उनकी रचनाओं में सरलता के साथ गहरी संवेदना और सामाजिक चेतना भी दिखाई देती है।
व्यक्तित्व और जीवन-दर्शन
हरिशंकर परसाई का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, स्पष्टवादी और संघर्षशील था। वे सच्चाई और ईमानदारी में विश्वास रखते थे। उनके मन में समाज के गरीब, शोषित और सामान्य लोगों के प्रति गहरी सहानुभूति थी। वे समाज में फैले पाखंड, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार और अन्याय के कट्टर विरोधी थे। उनका मानना था कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना और लोगों को सही दिशा दिखाना भी है।
परसाई जी तर्कशीलता, मानवता और सामाजिक समानता के समर्थक थे। उनका जीवन सादगी, संघर्ष और समाज सेवा का प्रेरणादायक उदाहरण है।
साहित्य में स्थान
हिंदी साहित्य में हरिशंकर परसाई का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानपूर्ण है। वे हिंदी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य लेखन के माध्यम से समाज की बुराइयों, भ्रष्टाचार, पाखंड और राजनीतिक विसंगतियों को उजागर किया। उन्होंने हिंदी व्यंग्य साहित्य को नई दिशा, नई पहचान और लोकप्रियता प्रदान की। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं।
सम्मान एवं पुरस्कार
हरिशंकर परसाई को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें 1982 ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
निधन
हरिशंकर परसाई का निधन 10 अगस्त 1995 ई० को जबलपुर, मध्य प्रदेश में हुआ।








