हम और हमारा आदर्श | Ham Or Hamara Adarsh

1. मैं खासतौर से युवा छात्रों से ही क्यों मिलता हूँ? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मैं अपने छात्र जीवन के दिनों के बारे में सोचने लगा। रामेश्वरम् के द्वीप से बाहर निकलकर यह कितनी लम्बी यात्रा रही। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो विश्वास नहीं होता। आखिर वह क्या था जिसके कारण यह सम्भव हो सका? महत्त्वाकांक्षा? कई बातें मेरे दिमाग में आती हैं। मेरा ख्याल है कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि मैंने अपने योगदान के मुताबिक ही अपना मूल्य आँका। बुनियादी बात जो आपको समझनी चाहिए वह यह है कि आप जीवन की अच्छी चीजों को पाने का हक रखते हैं, उनका जो ईश्वर की दी हुई हैं। जब तक हमारे विद्यार्थियों और युवाओं को यह भरोसा नहीं होगा कि वे विकसित भारत के नागरिक बनने के योग्य हैं तब तक वे जिम्मेदार और ज्ञानवान नागरिक भी कैसे बन सकेंगे।

प्रसंग – प्रस्तुत गद्यांश में डॉ० कलाम अपने युवाओं से जुड़ाव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं।

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व्याख्या- डॉ० कलाम का देश के युवाओं से बड़ा लगाव था। जब वे अपने इस लगाव के कारण पर विचार करते हैं तो उन्हें अपना छात्र-जीवन याद आ जाता है। उनके छात्र जीवन का आरम्भ भले ही रामेश्वरम् के एक द्वीप से हुआ हो, किन्तु उसके समापन की यात्रा बहुत लम्बी है, जो विश्व के प्रत्येक छोर तक पहुँची हैं। वे जब अपनी इस यात्रा को ‘पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें स्वयं पर विश्वास ही नहीं होता कि एक साधारण से व्यक्ति ने यह यात्रा संसाधनों के अभाव में कैसे पूर्ण कर ली। वे फिर से स्वयं से प्रश्न करते हैं कि आखिर वह कौन-सी प्रेरणा थी, जिसके चलते मैं ऐसी असम्भव यात्रा को भी सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सका। शायद इसकी प्रेरणा में उनकी महत्त्वाकांक्षा थी। मगर वे केवल महत्त्वाकांक्षा को इसका श्रेय नहीं देते। इस प्रश्न के उत्तर में उनके मस्तिष्क में अनेक बातें आती हैं, जिनमें वे सबसे महत्त्वपूर्ण इस बात को मानते हैं कि मैंने अपने योगदान अर्थात् किए गए कार्यों के अनुसार ही अपना मूल्यांकन किया। सफलता की प्राप्ति के रहस्य का उद्घाटन करते हुए वे युवाओं से कहते हैं कि इसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आपको यह बात भली-भाँति समझ लेनी चाहिए कि जीवन की हर अच्छी चीज को पाने का अधिकार आपको है। यहाँ पर वे प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार की बात करते हैं। वे आगे कहते हैं कि जब तक हमारे विद्यार्थी और युवा स्वयं पर यह विश्वास नहीं कर लेते कि हम अपने देश भारत को विकसित देश बनाकर उसका योग्य नागरिक बनने की योग्यता रखते हैं। जब तक उनमें यह विश्वास नहीं आएगा, तब तक वे जिम्मेदार तथा ज्ञानवान् नागरिक बन ही नहीं सकते, अतः उनका स्वयं में यह विश्वास रखना अत्यावश्यक है।

प्रश्न-

(क) लेखक युवा छात्रों से क्यों मिलता है?

(ख) आप किन चीजों के पाने का हक रखते हैं?

(ग) उक्त पंक्तियों से आपको क्या प्रेरणा मिलती है?

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर-

(क) लेखक युवा छात्रों से इसलिए मिलता है कि उन्हें देखकर अपने छात्र-जीवन की याद आ जाती है कि मैंने किन अभावों के बीच से निकलकर यह सफलता पायी है। इन छात्रों को भी वैसी ही सफलता मिलनी चाहिए।

(ख) हम उन चीजों को पाने का हक रखते हैं, जो ईश्वर की दी हुई है।

(ग) उक्त पंक्तियों से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि सफलता प्राप्ति के लिए स्वयं में आत्मविश्वास जगाना होगा।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या के लिए उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ङ) पाठ का शीर्षक ‘हम और हमारा आदर्श’। लेखक – डॉ० ए०पी० जे० अब्दुल कलाम।

2. मैं यह नहीं मानता कि समृद्धि और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी हैं या भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखना कोई गलत सोच है। उदाहरण के तौर पर, मैं खुद न्यूनतम वस्तुओं का भोग करते हुए जीवन बिता रहा हूँ, लेकिन मैं सर्वत्र समृद्धि की कद्र करता हूँ; क्योंकि समृद्धि अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है, जो अन्ततः हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक है। आप अपने आस-पास देखेंगे तो पाएँगे कि खुद प्रकृति भी कोई काम आधे-अधूरे मन से नहीं करती। किसी बगीचे में जाइए। मौसम में आपको फूलों की बहार देखने को मिलेगी अथवा ऊपर की तरफ ही देखें, यह ब्रह्माण्ड आपको अनन्त तक फैला दिखाई देगा, आपके यकीन से भी परे।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने समृद्धि अथवा भौतिक तथा अध्यात्म दोनों को ही व्यक्ति के लिए आवश्यक बताते हुए समृद्धि अथवा भौतिक प्रगति के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या- अपने चिन्तन के आधार पर लेखक कहते हैं कि जैसा कि कुछ भारतीय दार्शनिक कहते हैं कि समृद्धि या भौतिकता अथवा सांसारिकता और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी हैं, यह पूर्णतः अनुचित मान्यता है। वे समृद्धि और अध्यात्म दोनों को ही समन्वयात्मक रूप से जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं। वस्तुतः इसमें सन्देह भी नहीं कि हम इस संसार में भौतिक दृष्टि से सफल होकर ही बेहतर जीवन व्यतीत करने में सफल हो सकते हैं और सब प्रकार से सुखी तथा सन्तुष्ट व्यक्ति ही अध्यात्म की ओर आकृष्ट हो सकता है। भूखा या अभावग्रस्त व्यक्ति अध्यात्म के विषय में बिल्कुल नहीं सोच सकता। इसी आधार पर वे कहते हैं कि भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखना किसी भी प्रकार से अनुचित नहीं है और न ही यह अध्यात्म-विरोधी कार्य है। हमें भौतिक वस्तुओं की अभिलाषा रखते हुए अपने जीवन को यथासामर्थ्य सुविधापूर्ण बनाने का प्रयास करना चाहिए।

लेखक ने आरम्भ से ही अपने जीवन में कम-से-कम वस्तुओं का उपभोग करते हुए अपना जीवन व्यतीत किया, फिर भी वे सर्वत्र आर्थिक समृद्धि का सम्मान करते हुए उसे व्यक्ति के जीवन में नितान्त आवश्यक बताते हैं। उनकी यह प्रबल मान्यता है कि यदि हम आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होंगे तो हम सभी दृष्टियों से सुरक्षित रहेंगे। समृद्धि की स्थिति में हम धन, मकान, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा आदि के अभाव में उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने से वंचित न रह सकेंगे। सभी संकटपूर्ण स्थितियों में हमारे पास आवश्यक संसाधन उपलब्ध होंगे। आर्थिक दृष्टि से समृद्ध होने पर ही हमारे मन में अपनी उन्नति, प्रगति और सुरक्षा के प्रति अधिकाधिक विश्वास रहेगा। इस विश्वास के साथ ही हम अपनी उन्नति को चरम तक पहुँचाने में सफल हो सकेंगे। हमारी इस समृद्धि का एक और महत्त्वपूर्ण परिणाम यह होगा कि हम अपनी आजादी को अथवा अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफल हो सकेंगे। हमारे आस-पास की प्रकृति भी हमें यही सीख देती है कि हमें कोई भी काम बेमन से नहीं करना चाहिए।

3. यदि हम अपने आस-पास के बगीचे में जाकर देखें तो हमें ज्ञात होगा कि प्रकृति भी कोई काम अधूरे मन से नहीं करती। वह अपने मन से उल्लसित होकर अपना कार्य करती दिखाई देगी। फूलों के मौसम में बगीचों में चारों तरफ विभिन्न प्रकार के फूल अपनी डालियों पर झूमते नजर आएँगे। वे अपनी सुगन्ध दूर-दूर तक फैलाते हुए और सभी को अपनी ओर आकर्षित करते दिखाई देंगे। यदि हम आकाश में ऊपर की ओर देखें तो हमें अन्तहीन ब्रह्माण्ड चारों तरफ फैला दिखाई देगा। इतनी दूर तक और इतना अधिक व्यापक कि हम उसके इतना व्यापक होने पर विश्वास भी नहीं कर सकते। इसलिए प्रकृति से सीखते हुए हमें भी इन सभी क्षेत्रों में अपनी समृद्धि हेतु अपना कार्य पूरे मन से करना चाहिए।

प्रश्न-

(क) गद्यांश से सम्बन्धित पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए। अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ख) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

(ग) लेखक के अनुसार कौन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं?

(घ) लेखक ने किस स्थिति में अपना जीवन व्यतीत किया?

(ङ) भौतिक समृद्धि अपने साथ क्या लाती है?

(च) समृद्धि अन्ततः किसे बनाए रखने में सहायक है?

(छ) समृद्धि और अध्यात्म के सम्बन्ध में लेखक क्या नहीं मानता ?

(ज) भौतिक समृद्धि के महत्त्व के विषय में लेखक की क्या मान्यता है?

(झ) लेखक के अनुसार मनुष्य को जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक वस्तुओं को किस प्रकार स्वीकार करना चाहिए?

उत्तर-

(क) प्रस्तुत गद्यांश भारत के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक, दार्शनिक और लेखक डॉ० ए० पी० जे० अब्दुल कलाम द्वारा लिखित ‘हम और हमारा आदर्श’ नामक आत्मकथात्मक लेख से उधृत है। यह लेख हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।

(ख) उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ग) लेखक के अनुसार समृद्धि और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं है।

(घ) लेखक ने न्यूनतम वस्तुओं का भोग करते हुए अपना जीवन व्यतीत किया।

(ङ) समृद्धि अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है।

(च) समृद्धि अन्ततः हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक है।

(छ) समृद्धि और अध्यात्म के सम्बन्ध में लेखक यह नहीं मानता कि ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं।
(ज) भौतिक समृद्धि अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है, जो हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक हैं।

(झ) लेखक के अनुसार मनुष्य को जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक वस्तुओं को खुले मन से बिना किसी संकोच के स्वीकार करना चाहिए।

4. जो कुछ भी हम इस संसार में देखते हैं, वह ऊर्जा का ही स्वरूप है। जैसा कि महर्षि अरविन्द ने कहा है कि हम भी ऊर्जा के ही अंश हैं। इसलिए जब हमने यह जान लिया कि आत्मा और पदार्थ; दोनों ही अस्तित्व का हिस्सा हैं, वे एक-दूसरे से पूरा तादात्म्य रखे हुए हैं तो हमें यह एहसास भी होगा कि भौतिक पदार्थों की इच्छा रखना किसी भी दृष्टिकोण से शर्मनाक या गैर- आध्यात्मिक बात नहीं है।

प्रसंग- इस गद्यांश में लेखक ने आत्मा और पदार्थ, दोनों को ही ऊर्जा अथवा उस परमशक्ति का अंश बताया है तथा इस आधार पर यह स्पष्ट किया है कि भौतिक पदार्थों की इच्छा रखना किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है।

व्याख्या- लेखक ने अपने दार्शनिक एवं यथार्थ जगत् सम्बन्धी ज्ञान के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि हम इस संसार में जो कुछ भी देखते हैं, वह ऊर्जा का ही एक रूप है। इस ऊर्जा को ही हम परम सत्ता, परमात्मा आदि के नाम से जानते हैं। हमारे शास्त्रों में भी बड़े विस्तार से और अनेक उदाहरणों के माध्यम से इस सत्य को स्पष्ट किया गया है कि सारा संसार परमात्मामय है। इस संसार के सभी प्राणी और समस्त प्रकृति या सभी वस्तुएँ उस परम सत्ता अथवा ऊर्जा का ही अंश है। यहाँ तक कि हम जो कुछ भी नवीन कहा जानेवाला सृजन करते हैं, वह भी उसके बनाए पंचतत्त्वों के समन्वयात्मक संश्लेषण का ही परिणाम होता है। हमारे समस्त प्रयास अथवा कर्म भी उसकी ही कृपा से सम्भव होते हैं। लेखक के अनुसार उनके इस कथन के अनुरूप भारत के प्रख्यात दार्शनिक महर्षि अरविन्द ने भी यही कहा है कि हम ऊर्जा के ही अंश हैं। इस प्रकार प्राणी या पदार्थ अथवा आत्मा और पदार्थ; दोनों ही उस ऊर्जा के अंश हैं और दोनों में ही अभिन्न सम्बन्ध है। लेखक के अनुसार जब हमें यह ज्ञात हो ही गया है कि संसार में सबकुछ परमात्मामय है, सबकुछ उसी ऊर्जा का ही अंश है तो हमें भौतिक पदार्थों की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हमें आत्मा के साथ-साथ भौतिक पदार्थों को भी समान रूप से सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए। यही नहीं, भौतिक पदार्थों की इच्छा रखना किसी भी दृष्टि से लज्जाजनक अथवा अध्यात्म के विरुद्ध बात नहीं मानी जानी चाहिए। हमें अपेक्षित भौतिक पदार्थों की इच्छा अपने मन में रखनी चाहिए और उनकी प्राप्ति हेतु अपने पूरे विश्वास और पूरे मन से प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए। अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ग) हम इस संसार में जो कुछ भी देखते हैं, वह किसका स्वरूप है? अथवा हम इस संसार में जो कुछ देखते हैं वह क्या है?

(घ) महर्षि अरविन्द ने क्या कहा है?

(ङ) ‘अस्तित्व’ और ‘तादात्म्य’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

(क) प्रस्तुत गद्यांश भारंत के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक, दार्शनिक और लेखक डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम द्वारा लिखित ‘हम और हमारा आदर्श’ नामक आत्मकथात्मक लेख से उधृत है। यह लेख हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।

(ख) उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए।

(ग) हम इस संसार में जो कुछ भी देखते हैं, वह ऊर्जा का स्वरूप है।

(घ) लेखक के अनुसार महर्षि अरविन्द ने यह कहा है कि हम भी ऊर्जा के ही अंश हैं।

(ङ) ‘अस्तित्व’ का अर्थ विद्यमानता (होने का भाव) है और ‘तादात्म्य’ का अर्थ समन्वय है।

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